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बघेलवैशवर्णन । ( ६९७ ) | दोहा-कछ दिनमें आवत भयो, जयपुरको नरनाह ॥ शाहन करन पनाहभे, भूपति जेहि कुलमाह ॥१८॥ भगिने उभय रह जानकी, कृष्ण कुवरि जिन नाम ॥ व्याहि विदा कीन्ह्यो तिन्हैं,दै बहु धन अभिराम ॥२९॥ पुनि बीते कछ काल श्री, विश्वनाथ नरपाल ॥ है वश काल निवास किय,पास अवधपति लाल१६०॥ श्रीरघुराज तनय तेहि केरो । हरिइच्छा गुणि बिन अवसेरो ॥ मानि राज्य सब यदुपति केरी । कामदार सों कह्यो निवेरी ॥ राजाराम राज्यके एकू । तिनकी कृपा न भय मोहिं नेकू ॥ स्वााम धर्मरत जन हितकारी । करिहैं कबहूँ न काम बिगारी ॥ सुदिन अबै न राज अभिषेकू । कह्यो ज्योतिषी सहित विबेकू ॥ ताते मो मन भावत येहू । करो यज्ञ संमत करिदेहू ॥ सुनि दिवान कह बहुत सराही । प्रभु भल कह्या ऐसहीं चाही ॥ तब रघुराज परम सुख पाई । आशु बनारस मनुज पठाई । दोहा--विप्र वेद वित छित्र बहु, रीवां नगर बोलाय ॥ . सुदिन शोधाय सचाय गो, लछिमनबाग सिधाय ६१॥ तहँ किय कठिन कायको नेमा । पगो परम यदुपति पद प्रेमा । मज्जन कार गायत्री जापा । प्रथम करै नितहरै जो पापा ॥ पुनि षोडश प्रकार भरि चायन । पूजन करै रमा नारायन । पुनि नारायण अष्टाक्षर मनु । बीसहजार जपें निश्चल मनु ॥ यही भांति विपनहुँ जपावै । रहै यकांत अनत नहिं जावै ॥ पुरश्चरण सौ दिन करि यहि विधि । कृष्ण कृपा पात्रता लही सिधि ॥ कह्यो स्वप्नमें आय मुरारी । राज्य केरै है मम अधिकारी ॥ लहत मनहिं मन परमहुलासा । कोहुसों कबहुँ न कियो प्रकाशा ।। दोहा--जप अष्टाक्षर मंत्रक, बीस हजार केर ॥ जौल रहै शरीर जग, किय संकल्प करेर ॥ ६२ ॥