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                 आदिमंगल।                                 
                                (१७)
इहां कबीरजी,कहै हैं कि तेहिंपीछे कहे जब संसारकी उत्पत्ति द्वैगई औ जोव नाना दुःख पावन लगे तब साहिब जे दयालु तिनके दयाभई कि हम अपने नामको उपदेशकियो कि हमारे रामनाम को जो यह अर्थ लक्ष्मण जानकी हम भरत शत्रुघ्र हमारे हंसरूप पार्षद तिनको जानिकै हमारेपास अवै औये सबजाव संकर्षण आद्यापराशक्ति शब्दब्रह्म नारायण महाविष्णु जीव इनके पक्षमें रामनामकी छवोमात्रा लगाइकै औरे औरे मतनमें लगिके संसारी है कै नानादुःख पावन लगे । तब रामनाम को यथार्थ अर्थ बतावनको हमको भेज्या सो हम सारशब्द जो है रामनाम ताको सत्यकहे सांच जो अर्थहै ताके बतावनके हेतु आये सो आदि अंतकी उत्पत्ति हम तुमसे कहे देयहैं । आदिकौन है जोयह उत्पत्ति है आई संसारभयो औअंतकौन है जो हम रामनामको सांचअर्थ बतायो सो अर्थ समुझिलइ साहबके पासजाय वाको संसारको अंत हेजाइ है । फिर संसारमें नहीं आवै । सो यह आदिअंतकी उत्पत्ति हमतुम सों कहिदिया कि यहिभांतिते जगत्की उत्पत्ति होय। जीवसंसारी हाइहैं औयहि भांतिते जब रामनामको सांचअर्थ जाने है तब संसारको अंत है जाइहै ॥२०॥ 
दोहा-सात सुरति सव मूल है, प्रलयहु इनहीं माहिं ।।

| इनहीं मासे ऊपजै, इनहीं माहिं समाहिं ॥ २१ ॥

इहांमंगलको उपसंहारकरैहै सबकीमूल सातसुरतिने प्रथम वर्णन कर आयेहैं सो वेतो सोई सुरति स्थूलरूप सात रूपते प्रकटभईहै सातकौन है; दुइच्छा एकयोगमाया एकजगत्को अंकुर कारणरूपा की पांचौब्रह्मरूपा येई सातौसबकेमूल इनहींत उपजैहैं इनहीं ते प्रलय द्वैनायहै कहे नाशलँदै जायेहै औ इनहींमें पुनिसमाइहै साता सूरातमें प्रमाण साखी शंकरगुष्ठकी ॥ “निरअंजनअक्षर अचित वोहंसोहंजान । औपुनिमूलकूरकहि सात सूरति परमान ॥ २१ ॥

दोहा-सोई ख्याल समरस्थ कर, रहसो अछप छपाइ ॥
सोई संधिलै आयउ, सोवत जगह जगाइ ॥ २२॥
सो समष्टिजीव अपनेको समर्थ मानिकै साहबको न जानि कै यह ख्याल करतभयो अछपकहे रामनामके अर्थमें साहव न छपे रहे औ सर्वत्र पूर्णरहे सा