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(९८४) बीजक कबीरदास । पीपर एकजो महँगे मान । ताकर मम न कोऊजान । डारलफायनकोऊखायाखसमअछत्बहुपीपरजाय॥१४॥ एकपपरके बृक्षको सबै महँगे मानिलियो है सो वह ब्रह्महै अनुभवगम्य है वाको मर्म कोई नहीं जानै है कि पीपरको डार लफायकै कोई नहीं खायहै अर्थात् वा अलख है कैसेमिली वात कथनमात्रही है सो साहब कहै हैं कि जीवनको खसम अछत मैं बनैहौं ताको तौ नहीं प्राप्ति होय वहपीपरनो ब्रह्म ताहीमें सब चलेजातहैं सो वह ब्रह्म ज्ञई है तामें प्रमाण मूल रमैनीको ।।

  • निर्गुणअलख अकह निरबाना । मन बुधि इन्द्री जाहि न जाना ॥ बिधिनिषेध जहँवाँ नहीं होई । कह कबीर पद झाँई सोई ॥ पहिले झाँई झाँकते, पैठी सन्धिककाल । झाँईकी झाँई रही, गुरुबिन सुकैको टाल ॥ १४७ ॥

शाहू ते भो चोरवा, चोरन ते भो जुज्झ ॥ तब जानैगो जीयरा, मार परैगो तुज्झ ॥ १४८॥ प्रथम शाहु रहें कहे शुद्धरहेही सो ब्रह्ममाया मनचोर तिनमें लगिकै तेंहूं। चोर द्वैगये अर्थात् उपदेश करिकै जीवन के साहब को ज्ञान चोराय लियो काहूको कह्यो कि ब्रह्म तूही है काहूको कह्यो कि आदिशक्तिको भजु जगत्को कत्ती वही है काहूको कह्यो जो मनमें आवै सो करु बन्धमोक्षको कारण मनै है याही रीति गुरुवाचरन ते जुझ भयो सो तुज्झ कहे तोहीं तबहीं समुझि परैगो जब यमको सोंटा शीशमें लंगैगो तब तब जानैगो कि रक्षकको भुलाय दियो ॥ १४८ ॥ ताकी पूरी क्यों परे; गुरु न लखाई वाट ॥ ताको वेरा बुड़िहैं, फिरि फिरि अबघट घाट ॥१४९॥ जाको गुरुने साहब के पास पहुँचिबे की बाट नहीं लखाई ताकी पूरि कैसे परै ताकी बेरा जो है ज्ञान सो अवघटघाटमें बूडि जाइगो अर्थात् जब उनके शरीर छुटिजायँगे पुनि पुनि जनम मरण होइगो तब वा ज्ञान भूलिजायगो १,४९॥