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साखी । १६७३ ) ताते ज्ञानकांड निकर; औ पाचोमुख निरंजन ताते अद्वैतबिज्ञान निकरा सो ऐसे पंचमुखी सर्पमें बेराको बांध्या आपने मनसे कल्पिकै भवसागर अनुमानाकयों ताको मान्यो तब ये नरदेहमें पंचमुखी सर्प अहंकार उठा तौने अहंकारको पहिरिकै वामें सब जीवचढ़े भवसागरपार होनके वास्ते सो अब जो बिचार कारकै छोड़ाचाहै तौ भवसागरकी भय लॉग है कि बूड़ि जायेंगे औ धरे रहै हैं तो सर्पडसै हैं सो पंचशरीराहंकार सर्पको बेराबने पर सब वाही में आरूढ़ हुये बेरा समुद्रकै पार नहीं जायसकै हैं तारहीमें रहिगये सो न बेराको गाहसकै न बेराको छोड़िसकै संसारसागरमें बूड़ते उतराते हैं ॥ ११६ ।।। कर खोरा खोवा भरा, मग जोहत दिन जाय ॥ कविरा उतरा चित्तसों, छाँछ दियो नहिं जाय ॥ ११७॥ गुरुमुख–जे साहबकें जनहैं ते कौनी भांतिते जाने जायहैं कि पूरहैं सर्वत्र साल को देखै हैं हाथमें खोचा भरा कटेरा लीन्हे राह जॉहै हैं कि कोई आवै खाय सो सर्वत्र ता साहिबैको देखे हैं ताते जोई आयकै खायहै ताको साहबै जानै है औ साहिबै मानिकै आदरकरै हैं औ खोवा खवावै हैं औ कबहूं पुरुषबचन नहीं बॉलैहैं ते जीव साहबके प्यारे हैं औ जिनसों मारै दौरे हैं ते कबीर कायाके बार जीव साहबके चित्तते उतरि जाय हैं अर्थात् वे मुक्ति कबहूँ नहीं पावै हैं संसार हीमें परै हैं । अथवा यह साखी गुरुमुख है ताते यह अर्थ है साहबक है हैं कि खेवा भरा कटोरा हाथमें लियेहौं रामनाम उपदेश करौह यह कैसा है कि कहतमें सरल है फिार कायाको कलेश कौनौ न करनपरै औ सबको अधिकार है। जैसे खोवा खातमें नं कौनो अरसाहै न कौनौ श्रम ऐसे रामनाम रूपी खावा उपदेशरूप लियेहाँ जो कोई याको खाय अर्थात् स्मरणकरै तो मैं वाको संसारते छोड़ायदेउँ जो मेरे पास आवै तौनेको । सोहे कायाके बीर कंवरजीव ! जो नहीं ग्रहणकरै हैं तैमेरे चित्तमें उतरि जायहैं उनको छाँछऊ मोसों दियो नहीं जाय अरु ज्ञानादिक कर्मादिक के फलत मैं देउहाँ सो उनके उत्तम कर्महूंके फलभोंसो नहीं दिये है जायँ अर्थात मेरो चित्तनहीं चाहै है कि छाँछ जे हैं ज्ञानादिक ते उनके उत्तम् कर्मादिकके फलदेउँ सो श्रीकबीरजी कहै हैं कि अबै साहब समझनै