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(९०६) बीजक कबीरदास । मरकट मूठी स्वादकी मन बौराहो । लीन्हों भुजा पसार समुझ मन बौराहो ॥ ७ ॥ छूटनकी संशय परी मन बौराहो । घर घर खायो डॉग मन बौराहो ॥ ८॥ ज्यों सुवना नलिनी गह्यो मन बौराहो । ऐसा मर्म विचार समुझ मन्द बौराहों ।। ९ ।। पढ़े गुने का कीजिये मन बौराहो । अंत विलैया खाय ससुझ मन बौराहौ ॥ १० ॥ सूने घरका पाहुना मन बौराहो । ज्यों आवै त्यों जाय ममुझ मन बौराहो ॥ ११ ॥ न्हाने को तीरथघनी मन बौराहो। पूजैका बहुदेव समुझ मन बौराहो ॥ १२ ॥ बिनपानी नर बुड़िया मन बौराहो । तुम टेकडु राम जहाज समुझ मन बाराहो ॥ १३॥ कह कबीर जग भर्मिया मन बौराहो । तुम छोड़े हरिका सेव समुझ मन बौराहो ॥ १४ ॥ जारहु जगको नेहरा मन बौराहो। जामें शोक संताप समुझ मन बौराहो ॥ १ ॥ कालबूतकी हस्तिनी, मन बौराहो । चित्र रचो जगदीश समुझ मन बौराहो ॥२॥