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भूमिका।

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| इस ग्रन्थके प्रथम कबीरकसौटी, सत्यकबीरकी साखी और कबीर उपासना पद्धति नामक पुस्तकें छप चुकी हैं, । सत्य कबीरकी साखीको भूमिकाकी . प्रतिज्ञानुसार बीजककी टीकाओको छापना आरंभ किया है ।

   बीजककी कईटिकाओमें यह टीका परम प्रसिद्ध और वैष्णवमात्रको ‘मान्य है। मान्य क्यों नहो जबकि साकेतविहारी भगवान् रामचन्द्रजीके अनन्य उपासक, वेद, शास्त्रके पूर्ण ज्ञाता, सांगीत आदि विद्या कुशल श्रीमन्महाराजाधिराज बाँधवेश, रीवाँधिपति साकेतनिवासी श्रीमहाराज विश्वनाथ सिंहजूदेव बहादुरने स्वयम् इसकी टीका की है। इस परभी सोनामें सुगन्ध यह है कि यह टीका भी स्वयम् कबीर साहबकी आज्ञासे हुई है और श्री कबीर साहबने इसे पसन्द भी कियाहै जिसका विस्तृत विवरण इस पुस्तकके आदि मंगलकी टीकामें मिलेगा ।
  जब कि समयके फेरसे भारत वर्षसे वीरता, लक्ष्मी और विद्या तीनोने भारतपर कोप कर सात समुद्र पार जा बसनेकी प्रतिज्ञाली है तब भी पवित्र बघेलवँशीय बाँधवेश, रीवाँधिपतिके वंशमें धर्मके संपूर्ण स्वरूपसें विराजनेके कारण तीनोंही एक स्थानमें पाये जाते हैं।
 जिसका कुछ वर्णन इसी पुस्तकके अन्तमें छपे हुए बघेल बंशागमनिर्दश नामक पुस्तकके बँचिनेसे ज्ञात होगा ।

उसी पवित्र वंशके वर्तमान नृप श्रीमान् गोब्राह्मण प्रतिपालक, बघेल कुल तिलक, अवनीश, बान्धवेश, रीवॉनरेश, प्रजाप्रिय, सिद्धि श्री मन्महाराज धिराज श्री १०८ श्रीमहाराज श्रीसीताराम कृपा पात्राधिकारी सर वेङ्कटरमण रामानुजप्रसाद सिंह जू देव बहादुर जी. सी. एस. आई-की आज्ञानुसार यह पुस्तक छापी गयी है । इतनीही नहीं आपने अपने पूर्वजोंकी बनायी. हुई सर्व