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(३१८) बीजक कबीरदास । हे जीवौ ! तुम बड़े जड़ है जैसे पानीमें पाषाणकी रेखा कहे छोटी शर्बत पथरी डारि राखै तो और भभूका आगीको उठनलगै है । चकमक में ठोंकेते तैसे जस जस साधुलोग उपदेश करत जाइहैं तस तसे साहब को भनन तौ नहीं करोही और काम क्रोध आदिक जे आगी हैं तें तुमको जोर करत जाई हैं । अर्थात् जब उपदेश करन लगै है तब अधिक रिस करन लगौहौ, जैसे पाषाणमें नित हजारन घड़ा जल डोरै पै पाषाण भीतर सूखै रहै है जैसे केतऊ ज्ञान उपदेश करै परन्तु हे जीवौ । तुम जड़के जड़ही बने रहौहौ ॥२॥ सेते सेते सेत अंगभो शयन बढी अधिकाई। जो सनिपात रोगिअहि मारै सो साधुन सिधि पाई ॥३॥ सेत सेत जो ब्रह्लहै तामें लगे लगे तुम भीतर बाहर सपेद द्वैगये अर्थात् बुढ़ाय गये ऊपरौ के रोमा बुढ़ाय गये । ब्रह्ममें सोवत सोवत तोको आपनों स्वरूप भूलिगयो तब शयनमें कहे सो वन अधिकाई बढ़ी कहे अधिक सोवनळगे अर्थात् समाधिकरनळगे । अपनीआत्माको ज्ञान औ साहबको ज्ञान औ जगत् भूलिगयो पिशाचवत् मूकवत जड़वत् उन्मत्तवतु बालवत तेरीदशाद्वैगई । सोई लक्षण सन्निपातमें होइहै सो तोको सन्निपात भयो है । सन्निपातरोग याको मौरैहै औ उनको आत्माको ज्ञान भूलि जाइहै । ब्रह्म हैबो साधुलोग सिद्धि पाई हैं कि, हम सिद्धहैं यह मानि ले ही आत्माको ब्रह्म वैबो असिद्धहै। सो आगे कहै हैं । * सीते सीते पाठहोइ तौ ज्ञान करत करत कि, संसार ताप हंमारो छूट जाइ शीत अंग द्वैगये । कहे सन्निपातकी अधिकाई तुम्हारे अङ्गमें बढ़िआई अर्थाव सन्निपात में खबरि देह की भूलि जाइहै । औ रोगयनका मारै है सोई साधुलोग सिद्धिपाई है कि, हमको देहकी खबरि भूलिगई हम सिद्ध द्वैगये ॥ ३ ॥ अनहद कहत कहत जग विनशे अनहद् सृष्टि समानी ॥ निकट पयाना यमपुर धावै बोलाहि एकै वानी ॥४॥ वह जो ब्रह्म है ताकी हद्द नहीं है ताको अनहद कहत कहत कहे नेति नेत कहत २ संसार विनशि गयो । अनहद जो ब्रह्म है तामें सृष्टिके सब