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शब्द । ( ३१७) अथ सत्तावन्वां शब्द ॥ ५७॥ शब्द संधु सुधारत नाही अधर थे हियाकी फूटी ॥१॥ पानी माहँ पषानकी रेखा ठोंकत उठे भभूका । सहस घड़ा नितही जल ढारै फिरि सूखेङ्गा सूखा ॥२॥ सेते सेते सेत अंग भो शयन बढी अधिकाई। जो सनिपात रोगि अहि मारै सो साधुन सिधि पाई ॥३॥ अनहद कहत कहत जग विनशे अनहद सृष्टि समानी। निकट पयाना यमपुर धावै वोलहि एकहि बानी ॥४॥ सतगुरु मिले वहुत सुख लहिया सतगुरु शब्द सुधारै। कह कवीर सो सदा सुखारी जो यहि पदहि विचारै ॥६॥ ना हरि भजै न आदत छूटी । शब्दै समुझि सुधारत नाहीं अँधेरे भये हियो की फूटी॥१॥ ना रौं हरि भजै है अरु ना तेरी आवागमनकी आदत कहे स्वभाव छुट्यो । यह अर्थ साहबके कहे शब्दको सुनिकै औ विचारिकै जो आपनो नहीं सुधौरहै। सो काहे नहीं सुधरैहै । काहेते कि, साहब कहतई जाइहै कि, जो मो को अबहूं जीव नानै तौ कालते छोड़ाय लेउँ । ताते आंधर भये हियोकी तिहारी फूटिगई कहे यह आदत करत करत वृद्धावस्था पहुँची इन्द्रियन, जवाब दियो तामें प्रमाण । * नेह गये नैना गये, गये दांत औ कान । प्राण छरीदा हिगये, तेऊ कहत हैं जान ।। अबहूं तौ जानौ भजन करिकै छुटिजाउ॥ १॥ पानीमाएँ पषानकी रेखा ठोंकत उटै भभूका ॥ सहसे घड़ा नितही जल ढारै फिरि सूखेका सूखा ॥२॥