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(२५६) बीजक कबीरदास । पौविनुपत्रकरहविनुतुम्बा विनुजिह्वागुणगावै ।। गावनहारकेरूप न रेखा सतगुरुहोइलखावै ॥३॥ अब श्रीकबीरजी जीवात्मा को वृक्षरूप वैकै बर्णन करैं है पौबिनु कहे आत्माको जगत्को अंकुर नहीं है मनके संयोगते दुःख सुखरूप पत्रदुइ लागबेई किया औ करहूनो कर्म है सो नहीं रह्यो आत्मामें जगरूप तुम्बा लागवेई कियो । यह जीवात्माकी दशाकाहतेभई कि, बिनु जिह्वा जाहै निराकार ब्रह्म ताके जे गुणहैं देश काल बस्तु परिच्छेद ते शून्यत्व सो आपने में लगावन लग्यो । ये गुण मोहों में हैं मेरोस्वरूप यही है सो जो या आपनेको ब्रह्ममान्य तौ आत्माके ब्रह्मकेरूपको रेखनहीं है काहेते याको देश बना है। समष्टि जीवलोक प्रकाशमें रहेहैं, और कालबन्यो है जौनेकालमें समष्टित व्यष्टि होय है, औ या देश काल बस्तु पारच्छेदते संहितेहै काहेते अणुहै भगवास है तामें प्रमाण ॥ “बालायशतभागस्यशतधाकल्पितस्यच॥ भागोजीवःसविज्ञेयः सचानंत्यायकल्पते' इतिश्रुतिः अंशांनानाव्यपदेशात्ते ॥ ३ ॥ पक्षी खोज मीनको मारग कहे कबीर दोउ भारी । अपरम पार पार पुरुषोत्तम मूरत की बलिहारी ॥४॥ ताते मीनकी नाई संसारते उलटी गति चलिंकै पक्षी जो हंस स्वरूप आपनो ताको खोज कबीरजी कहै हैं ये दोऊ भारी हैं संसारते उलटी गति होइबो:यह भारी है, आपनो हंसरूप पाइबो यहू भारी है । सोसंसारते उलटी गति करि हंसरूप पाइकै परमपर जो आत्मारूप पार्षदरूप ताहूते उत्तम जे परमपुरुष पर श्रीरामचन्द्र तिनकी बलिहारी जाय । भाव यह है तब तेरो जनन मरण छूटैगो ॥ ४ ॥ रूप पार्षद छै नचन्द्र तिनकी इति चौवीसवां शब्द समाप्त ।

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