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( ७२ ) बीजक कबीरदास । अथ सोरहवींरमैनी। चोपाई। चलतचलतअतिचरणपिराने।हारिपरेतहँतिखिसिआने गणगन्धर्वमुनिअंतनपाया । हारिअलोपजगधंधे लाया २ गहनी वंधन बांधन सुझााथाकि परे तब कछू न बूझा ॥३॥ भूलिपरे जिय अधिक डेराई।रजनी अंधकूप वैजाई ॥ ४॥ मायामोह उहाँ भरि भूरी । दादुर दामिनि पवनहु पूरी ॥६॥ बरसै तपै अखण्डित धाराारैनिभयावनि कछुन अहारा॥६॥ साखी ॥ सबैलोग जहँडाइया, औ अंधा सभै भुलान । कहाकोइ नहिं मानही, सव एकैमाएँ समान ॥ ७ ॥ चलतचलतअतिचरणपिराने।हारिपरेतहँ अतिखिसियाने नाना मतमें लगे जीव तिनकेचरण ब्रह्मके खोजहीमें पिरान लगे अर्थात् थकिआये मतिनहीं पहुंचै एकहू शास्त्रके बिचारके पार न गये तामें प्रमाण ॥ ( इन्द्रादयोपियस्यांर्तनययुः शब्दवारिधेः । प्रक्रियातस्यकृत्स्नस्यक्षमोवक्तुंनरः कथम् ) ॥ तब खिसि आइकै यह कहते ( भये अतिरेसयान पाठ होय तौ अर्थ कि बड़ेसयानो रहे तेऊ हारिगे ) ॥ १ ॥ गणगंधर्वमुनिअंतनपाया। हरिअलोपजगधंधेलाया ॥२॥ जौने ब्रह्मको अंतगन्धर्व औ मुनिनके गण नहीं पायो ताको हमकैसे जानिसकें । जो ब्रह्मको साकारकहै हैं तौमध्यम प्रमाणमें आयजाय है, अनित्य होय है । औ जो ब्रह्मको निराकारहै है तौलगत्की कर्तृत्व कैसे होयगो यही संदेह मेरे सिद्धांत न भयो । कबीरजी कहै हैं कि, कैसे होयगी सन्देहमें परे जैसे हार हैं तैसै बिनासदगुरुके बताये तोजानतही नहीं है, यहिते हरि अलोप