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(६५) रमैनी । सहज विचारत मूलगैवाई। लाभतेहानिहोयरेभाई ॥६॥ | सहजकहे सोहंसअहं यह प्रतिश्वास विचारतबिचारत सबको मूल जोमेरो नाम ताको आँवाय दियो अर्थात् भुलायदियो सो हे जीवौ ! तुमको तौ धोखा ब्रह्म की लाभभई परन्तु यह लाभते मेरे जाननेवाला जो ज्ञान ताकी हे भाइयो ! हानिद्वैगई अर्थात् नहा प्राप्तभई ॥ ५ ॥ अवयोगिनको कहै हैं । ओछीमती चन्द्रगो अथई । त्रिकुटीसंगमस्वामीबसई॥६॥ तवहीविष्णुकहासमुझाई । मैथुनाष्टतुमजीतहुजाई ॥ ७ ॥ | वीर्यकी उलटी गतिकरतकरत ओछीमतिकहे बुद्धयादिकसूक्ष्म है थिरलैगई तब चन्द्ररूप जो वायै सो अथैगयो अर्थात् उलटी गतिद्वैगई तब दूननेत्रको उलटिकै ध्यानलगाय माणके साथ वीर्यको चढ़ाय त्रिकुटीमें जहां इड़ा पिंगला गंगा यमुना सरस्वतीको सङ्गमम स्वामीबसैहै जहां पहुंचौहौ तब लक्ष्मीनारायण तुमसों कहै हैं कि अब ऊपर गैवगुफा में जायकै आठप्रकार के मैथुन जीति लेहु अबै एकही प्रकार जीत्या है तब तुम उहां जाउहै। सोआगे कहै हैं ॥ ६ ॥ ७ ॥ तबसनकादिकतत्त्वाविचारा। जैसेरंकधनपावअपारा ॥८॥ भोमर्यादबहुतसुखलागा। याहलेखेसबसंशयभागा ॥९॥ सो जबगैवगुफामें ध्यान लग्यो ज्योति में मिल्यो तब सनकादिक कहे शुद्ध जीवसो अपने को अशुद्ध मानिकै यही मरणतत्त्वविचारै है की, हम मुक्त है गये कहौ हे जीवौ ! तुम सब वाहीको सुखदतत्त्व बिचारौहौ । कैसे जैसेरंक अपारधन पायकै परमतत्त्व मानै है ८ भोमर्याद ब्रह्म जो ज्योति तामें जब आत्माको मिलायो ज्योतिही वैगयो यहीं तक मर्यादाहै या मान्य तब तुमको बहुत सुख लागतभयो अर्थात् वाही में मग्नहोइ जातेभये सो तुम्हारे लेखे तो सब संशय भागिगई परंतु संशय नहीं गई सो आगे कहैहैं ॥ ९ ॥