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बिहारी-रत्नाकर

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बिहारी-रत्नाकर [ तथा ] झपट कर [उससे एकाएक ] लिपट नहीं जाता, [ उस पुष्प का ] अति सुकुमार तन देखता हुआ [ उसे ] स्पर्श करते ( करने में ) [ अपने ] मन में नहीं पतियाता (इस बात का विश्वास नहीं करता कि यह मेरे भार को सहन कर सकेगा )। निरदय, नेहु नयौ निराख भयौ जगतु भयभीतु । यह न कहूँ अब ल सुनी, मरि मारियै जु मीतु ॥ ३७० ।। ( अवतरण )-नायिका ने मान किया है, और यद्यपि प्रेमाधिक्य के कारण मिलने के निमित्त वह मन ही मन विकल हो रही है, तथापि मान की मर्यादा रखने के लिये नायक से हँसती बोलती नहीं। उधर नायक भी अत्यंत दुख हो रहा है ! अतः मान छुड़ाने के लिये सखी कहती है-- ( अर्थ )—हे निर्दय, [ यह ] नया ( नए प्रकार का ) स्नेह देख कर जगत् ( सखीजगत्, सखी-मंडल ) भय से भीत हो रहा है । यह [ बात ] अव तक कहीं नहीं सुनी गई है कि [ स्वयं ] मर कर ( दुखित हो कर ) मित्र को मारा जाय ( दुःख दिया जाय ) ॥ भजन कयौ, तातै भज्यौ ; भज्यौ न एकौ बार। दूरि भजन जातें कह्यौ, सो मैं भज्यौ, गॅवारे ॥ ३७१ ॥ ( अवतरण )-कोई सजन भक़ अपने मन को धिक्कारता है ( अर्थ )-अरे आँवार, [ वेद-शास्त्रों ने जिसको ] भजने को कहा (बतलाया ), उससे [ तो तु] भागा, [ और उसको तूने ] एक बार भी नहीं भजा ( स्मरण किया )। [ पर ] जिससे (जिस विषय-भोग से ) दूर भागने को कहा, उसको तुने भजा (भोग किया) [ फिर भला तेरा निस्तार क्योकर संभव है ] ॥ । नैन लगे तिहिँ लगेनि जु, न छुटै छुटै हूँ प्रान ।। काम न आवत एक हूँ तेरे सैक सयान ॥ ३७२ ॥ ( अवतरण )-परकीया पूर्वानुरागिनी नायिका शिक्षा देती हुई सखी से कहती है ( अर्थ )-[ मेरे ] नयन जो उसकी लगन ( दर्शन की लालसा ) से लगे हैं, [ सो अब ] प्राण छूटने पर भी नहीं छूट सकते । तेरे ‘सैक सयान' ( सैकड़ों चतुराई-भरी शिक्षाएँ) एक भी ( कुछ भी ) काम नहीं आते ( उपयोगी नहीं होते ) ॥ उड़ति गुड़ी लखि ललैन की अँगना अँगना भाँह। बौरी ल दौरी फिरति छुवति छबीली छाँह ॥ ३७३ ॥ गुड़ी = गुबी, पतंग ॥ अँगना ( अंगना ) = स्री ।। अँगना = आँगन । १. गमार ( १ )। २. गैल ( २ )। ३. आए (२) । ४. सोक ( ३, ४, ५) । ५. लाल (४) । १. आँगन ( १, ३,४), अंगन ( ३ ) ।