पृष्ठ:बिहारी-रत्नाकर.djvu/१०२

यह पृष्ठ अभी शोधित नहीं है।
५९
बिहारी-रत्नाकर

________________

बिहारी-राकर की ओर इंगित कर के अथवा दीपक को वुझा कर ), विना बोले ही उत्तर दे दिया ( अपनी स्वीकृति विदित कर दी ) ॥ नायिका मध्या है, अतः दीपक के उजाले मैं विपरीत रति नहीं करना चाहती । सो उसने दीपक की ओर इंगित कर के यह व्यंजित किया कि यदि यह बुझा दिया जाय, तो ऐसा किया जा सकता है, अथवा दीपक बुझा कर उक रति के लिये अपना तैयार होना सूचित किया ॥ दीपक बुझाने से दीपक की ओर इंगित करने में विशेष लजी तथा सरसता है ॥ --- --- कैमैं छोटे नरनु हैं सरंत बड़ेनु के काम । मढ़यौ दमौमौ जातु क्य, कहि चूहे कैं चाम ॥ १३१ ॥ दमामौ = बड़ा नगाड़ा, जो ऊँट अथवा हाथी पर लाद कर ले जाया जाता है । ( अवतरण )-कवि की प्रास्ताविक उक़ि है ( अर्थ )--छोटे मनुष्यों से बड़ा के ( बड़ों के करने के अथवा बड़ों के लाभ के) काम कैसे चल सकते हैं (अर्थात् नहीं चल सकते ) । [ भला ] कहो [ तो सही कि ] चूहे के चमड़े से दमामा क्याँकर मढ़ा जा सकता है ।। सकत न तुव ताते बचन मो रस कौ रसु खोइ । खिन खिन औटे खीर लौं खरौ सवादिलु होइ ॥ १३२ ॥ ताते ( तप्त )= गरम, रोषान्वित ॥ मो रस = मेरे प्रेमानंद ।। रसु= स्वाद ॥ खिन खिन =क्षण इस में ॥ खीर ( क्षीर )=दूध ।। सवादिलु =स्वादु ।। ( अवतरण )-प्रातःकाल नायक को सापराध देख कर अधीरा नायिका परुष वचन कहती है। शठ नायक मीठी बातें बना कर उसका क्रोध शांत किया चाहता है ( अर्थ )-तेरे गरम ( रोषान्वित ) वचन मेरे प्रेमानंद के स्वाद को नष्ट नहीं कर सकते, [ प्रत्युत मेरा वह प्रेमानंद तेरे गरम वचनों से तप कर] प्रति क्षण औटे हुए दूध की भाँति अधिक स्वादिष्ट होता है । कहि, लहि कौनु सकै दुरी सौनँजाइ मैं जाइ । तन की सहज सुबास बनँ देती जौ न बताइ ॥ १३३ ॥ सौनजाइ =पीत चमेली ।। ( अवतरण )-सखी नायिका की गुराई तथा शरीर की सुगंधि की प्रशंसा करती हुई नायक को उसे लक्षित कराती है, अथवा अन्य सखी से कहती है ( अर्थ )-[ उस ] पीत चमेली में जा कर छिपी हुई [ नायिका ] को [ भला ]कह १. होत ( २, ४ )। २. बड़े ( १ ) । ३. दमामा (५)। ४. चूहा ( १ )। ५. कोन (४, ५ )। ६. सोनञ्चही (४), सोनजाइ (५) । ७. ता (४)।