पृष्ठ:बिरहवारीश माधवानलकामकंदला.djvu/१६८

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१४० बिरहबारीशमाधवानलकामकंदलाचरित्रभाषा। दो० मान्योकेकी कुहुककै विरही हो निशंक । चातक अवसर आपने तूमत सहै कलंक ॥ चौ० प्रथमनिदाघतपनितनतायो।वृच्योताहिअषाढ़पुनिलायो । ताहीपैसावन रिस कीन्ही । फिरतिहि खौफभादवै दीन्ही ।। अधम भूपभादों गतसोई । बड़ अंधेर रैनि दिन होई॥ दिनके राज सूर नहिं देखी। नहिं द्विजराज प्रसंग विशेखी। वरपतवडत नेम नहिं कोई । सरिता सखर नदिया सोई॥ चलत पंथ नीत नित खोटी। रानीजिनके बीर बहोटी। पानिप गलित थलऐसो । सुरभी दान शूद्रको जैसो ॥ सबथल पायपंक सरसानी। बेदविवाद मलिनतिय पानी॥ सजतन दूर कोकिला कीन्ही । विषहर भवीपातुरी चीन्ही ।। विदुवा कहत मैड़ कन काहीं। पढ़तवेदनिशिदिन जल माहीं।। अमलकमल फूल रह्यो न कोई। जिनको बिदुकराज छयैहोई ।। उडै लोयजुगनू लखिऐसे । चाहे कूरकूर नृप जैसे ॥ दो गौच जोंक अहि केंचुआ कान खतरे भेख । विच्छिनकोल पतंग डस भगदर बड़हिं अलेख । सो. भादों पटतर भूपहोय जो प्रजाअभागते। यमसम सरलस्वरूप अचल पंथतमरैनि दिन ॥ दंडक । सजल सरूप परमारथ सनेहीवार बेगि बलवान प्रा- यो गगन चढ़धायके। होंतो परपीरक विशेष तोहिं जान्यो बार वृष्टि के छाया म्हारी तपन बुझाय है । उत्तर सुनाऊं पायो उ. तर दिशाते जोपै कौन देश कौन गावँ बस्ती बताई है। मौनम- त होय येरेमेघा हमारे वीर मोपै सांचीकहु बालम विदेशी कब भाय है॥ सो बिरहबाउरी बाल तोहिंखबर कछु सम असम । इन मेघनके गाल गला होत करता बचै ॥ चौ० पैकुछ दोष तोहिं यहनाहीं। विरही विकलबाउरे आहीं।।