पृष्ठ:बिरहवारीश माधवानलकामकंदला.djvu/१६४

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१३६ विरहवारीशमाधवानलकामकंदलाचरित्रभाषा। गायथकेकविवोधा हकीमनको उपचारो । पैनाधरै वहधीर श्र- पिनावह मिलैपीरको जाननहारो॥ चौ० सखीआयतवनारिनिहारी । तजतप्राणनहिंआनविचारी॥ भलि यह प्रीति माधवा कीन्ही । यमके हाथवीच तियदीन्ही ॥ माधव नाम सुनतसुकुमारी । उठिपुनि पूरब दिशानिहारी॥ कीन्ह प्रलाप घटा लखिसोई । सुधि बुधि नाहिंन देई कोई ॥ (आषाढ़) छंद भुजंगी। महाकालकैधों महाकाल कूटै । महाकालिका के कैधों केश छूटै। कैधोंधूमधारा प्रलयकाल वारी ॥ कैधों रा हुरूपकैधों रैनकारी॥महा मत्तमानोमूहीकी हलावै । चढी चंचला ज्वाल माला फिरावे ॥रै मोरवाशोरखा भूमिछाई। करै तोखा पवन तीनों कसाई ॥ महाघोरवा मेघकी कोसम्हारै । चढ्यो ना कनाके सत्यो बारुझारै । करै कोकिलायों कलापा। नहेली। बिनामाधवा मोहिं जानो अकेली ॥ कहौं कौनपै को सुनै पार माई। बुरी आय आषाढ़ने लायलाई ॥ घटामध्यपापी वकापां- त जोरे । मनो मैनके बानविरही न छोरे ॥ अरे नग्रबासी परेचै. रमेरे ॥ सुगावै हिंडोरा सबैदेत टे रे॥ अरीप्रीतिकी रीति हौंतोन जानी। भईरी हफासेठ कैसीकहानी।। सानप्रीतिमें प्रीतम तो बिछुरो बनैकाहूनपीर सुनावतरी। विरही चकचोधिरही बनितांबेअषाढ़ी घटालखि आवतरी ॥ सुन भूली सुभान सौमुखा धुवानको धावन धावतरी । हफासेठ लौ वायेफिरे मुखको बनै रोबतहि अवनहिं गावतईरी ॥ बरवै । रोवत बनन गावत सहेशरीर। इहि अषाढ़ मोहिं बाढ़ी छंदभुजंगी। मरीआय आषाढ़नेगापारीमरीरीमरी माधवा मोहिं मारी । अरी चांदनी सेजलै दूरडारो। इतप्राय कासकीसे- ज्यास म्हारो ॥ तजौं प्राण हत्या पपीहै चढ़ाऊं । किधौं पापलै मोखा शाशनाऊं ॥ किधों दोष आषाढ़ के शीशडारों । किधों अटपट पीर ॥