पृष्ठ:बिरहवारीश माधवानलकामकंदला.djvu/११०

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८२ विरहवारीशमाधवानलकामकंदलाचरित्रभाषा। निकटन देख्यो मित्रको बाढी बिरहमजेज ॥ छंदविला । अतिबढ़ी विरह मजेज । प्रीतमन देख्योसेज। उठिचली अति अतुराय । आलिहि जगायो जाय॥सुन कोविं- दा दिलजानि । दुख जातनाहिं बखानि ॥ निशि जग्यो निदा भोइ । होरहीरंचक सोइ ॥ उठिगयो माधव मित्त । अबधिरनहीं मोचित्त ॥ यह आय कैसीबात । काहू लरख्यो नहिं जात ।। अब तजौं पलमें प्रान। कैमिलै माधौ धान ॥ तब कोबिन्दास खीधाय । तेहि सेजदेखीजाय ॥ तहँनहीं मित्रप्रवीण । नहिंव सनभूषण वीण ॥ इकचिट्ठी तिहिथलपाय । कोविन्दालई उ- ठाय ॥ वहबाँचि भई अचेत । विगरे गुनै सब नेत ॥ कियो माध वा यहहाल। कैसे जिये अब यहबाल ॥ छलि कै गयोवह छैल। अब हम पाइये किहि गैल ॥जो नहीं आवत विप्र । तोमरतबा ला क्षिप्रायहशोच मनमें कीन्ह। फिरि टरि बनि तै लीन्ह ॥ ति- हि सेज पै पौढ़ाय । बड़ी बेर लौ समझाय ॥ सुनिकंदलातु प्र- वीन | जिन करै चित्तमलीन ॥ हिय धीरधर सुनवात । विठुरै नमरिमरिजात ॥ मिलिकै जो बिछुरन होय । बिछुरो मिलै सब कोय ॥ यह चिट्ठी माधव केरि । वनिताहि लीन्हीं फेरि ॥ दो चिट्ठी माधव विप्र की क्षिप्र बाँचि कै बाल । प्रगट सुनायो सखिनको द्विजके हियको हाल ॥ (चिट्ठी उदाहरण) सोवत मैं तोकहँ तज्यों हे दिलवर दिल जान। सो न चूक मेरी कछू भीत भूपकी मान ॥ हाँ अपनो तन राखिकै डगखो प्रीति बिगोय। जो जीवत अवकी मिली तो सनेह थिर होय ॥ बरष एक लों परखिये हे कंदला सुजान। हत्या मेरे हनेकी जो तू तजि है प्रान ॥ कोटि २ तीरथ करौ योग यज्ञ जप दान । शीश ईश परवारिकै मिलो मित्र को आन ।