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व्यक्ति के मस्तक में हस्तप्रचार कर रही है, यह वृद्ध की पत्नी है। अटाह व्यतीत हुआ कि इस पीड़ित व्यक्ति को यहां लाये हैं। जलहिलोल में पीड़ा के किञ्चित् उपशम होने से वृद्ध के आत्मीय लोग अत्यन्त भावनायुक्त हुये, क्योंकि गंगायात्रा के पीछे किसी व्यक्ति के मरण न होने से इस देश में बड़े कष्ट का विषय होता है। बहु व्यय से प्रायश्चित करके उस दुर्भाग्य व्यक्ति को घर में ले जाना पड़ता है। तब भी एक अख्याति रही आती है। किन्तु आज झड़ वृष्टि देखकर वृद्ध के आत्मीय लोग बड़े सन्तुष्ट हैं। उन्होंने वृद्ध को गंगाजल में स्नान कराय कर दधि भात खिलाया। इस पर भी जिस घर में वृद्ध को रक्खा है उसके सब द्वार खोल दिये हैं उन खुले द्वारों में होकर विलक्षण सिग्ध मारुतहिकोल ब्टह में प्रवेश करता है इन सब कारणों से वृद्ध की नाड़ी अत्यन्त क्षीण हो गई। एक जन कविराज ने (जो निकट में था) नाड़ी पकड़कर कहा 'अब विशेष विलम्ब नहीं है।" सब जने वृद्ध के प्राणप्रयाण की प्रतीक्षा में बैठेही थे कि इतने में कविराज की अनुमति पाकर वे लोग उसे गंगाजल में ले गये। उस्को नाभिदेशपर्व्यन्त गंगाजल में रखकर और मस्तक पर गंगाजल और गंगामृत्तिका रख कर (कफ का जोर बढ़ाकर) सब जने हरिनाम करने लगे।