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बिरजा और नवीन दोनों जनों खाली हाथ में लेकर घाट पर गई है। पुष्करिणी के जल में असंख्य कुमुदिनी फूल रही हैं। सरोवर की गोद में तारकमण्डित पूर्णचन्द्र परिशोभित नील नभोमण्डल हँस रहा है। कुमुदपत्रगतवारिमध्य पर्यन्त में चन्द्ररश्मि खेल रही हैं। पुष्करिणी के चारो तोरस्थ वृक्षावली के पत्रों में चन्द्र किरणें छूट छूट कर गिर रही है। बिरजा ने जो थाली धोयकर खगड़ बँधे घाट की सिढ़ी पर रक्खी है, उस पर्यन्त में चन्द्र किरणें गिर २ कर हँस रही हैं। बिरजा घाट की सिढ़ी पर बैठी है, नवीन शरीर मलने को जल में उतरी है।

नवीन ने शरीर मलते २ एक दीर्घनिश्वास परित्याग की। विरजा ने वह लक्ष्य कर लिया कहा "नवीन! ऐसी लम्बी सांसें क्यों लेती हो?"।

नवीन— मन के दुःख से।

बिरजा—क्या दुःख है?

नवीन— वह क्या तुम नहीं जानती हो?

"जानती हूँ" कहकर कियत्क्षण नीरव हो, बिरजा ने फिर कहा कि 'ओ नवीन! यह क्या? तुम क्या रोती हो?

नवीन— हां रोती हैं।

बिरजा—इतने जल में खड़ी होकर क्यों रोती हो?

नवीन बिरजे! मेरा ऐसा कोई नहीं है तो रोने पर