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 चुप रहती थी, परन्तु नवीन से यह नहीं हो सका था। दूसरे के मन में चाहे कष्ट हों, वा न हो, वह सब समय में उचित बातही कहती थी। यद्यपि सत्य और उचित बात कहने में कुछ क्षति नहीं है परन्तु कहने से यदि दूसरे के मन में कष्ट होता हो तो उसकी अपेक्षा मौनावलम्बन करनाही अच्छा है। नवीन चाहे यह न जानती हो, चाहे न समझती हो। गंगाधर के संग नवीन के सुप्रणय न होने का यही एक प्रधान कारण था। गंगाधर समस्त दिन ताम्र पीटता, घर में आतेही एकान्त पाय कर नवीन उसक भर्त्सना करती, अकपट चित्त से उसके दोष की वार्ता उल्लेख करती। गङ्गाधर के मङ्गस्त साधनोद्देश्य से ही नवीन ऐसा करती थी किन्तु गङ्गाधर यह नहीं समझता था, वह मन में जानता था कि स्त्री स्वामी के अधीन होती है इसे स्वामी के दोष उल्लेख करने में उसका अधिकार नहीं है।

जो लोग स्त्री को घर की सामिग्री विशेष जानते हैं वे अवश्य गंगाधर के संग एक मत होंगे, और स्त्री के मुख से अपना दोषोल्लेख सुनकर विरक्त होंगे, परन्तु हम ऐसे महात्मा लोगों को बतलाये देते हैं कि स्त्री लोग अपने स्वामी को गृह की वस्तु विशेष नहीं समझती है। वह अपने को स्वामी के सुख में सुखी, दुख में दुखी, स्वामी को बन्धु, स्वामी को सुपरामर्शदाता मन्त्री, अधिक क्या