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७० भिक्षुराज अत्यन्त आवश्यकता है । वे भवसागर मे डूब रहे हैं, चूकि तथागत की ज्ञान-गरिमा से वे अज्ञात है। हम उन्हें अक्षय प्रकाश दिखाने जा रहे है। निस्सन्देह हमें कठि- नाइयो और आपत्तियो का सामना करना पडेगा। हमारे पास रक्षा की कोई सामग्री नही और शस्त्र भी नहीं। फिर भी अहिंसा का महामोहास्त्र तो हमारे हाथ है जो अन्त मे सबसे अधिक शक्तिशाली है। यह धीमी और गम्भीर आवाज़ उस अन्धकार को भेदन करके सब साथियों के कानो मे पड़ी। मानो सुन्दर पर्वत-श्रेणियो से टकराकर हठात् उनके कानों में घुस गई हो। बारहो मनुष्यों मे सन्नाटा छा गया, और सबने सिर झुका लिए। इन शब्दो की चमत्कारिक, मोहिनी शक्ति से सभी मोहित हो गए। दो घटे व्यतीत हो गए। तरणी जल-तरगो से आन्दोलित होती हुई उड़ी चली जा रही थी। राजनन्दिनी ने मौन भग किया। कहा-भाई, क्या मै अकेली उस द्वीप की समस्त स्त्रियों को श्रेष्ठ धर्म सिखा सकूगी? महाराजकुमार ने मृदुल स्वर में कहा-आर्या संघमित्रा ! यहा तुम्हारा भाई कौन है ? क्या तथागत ने नही कहा है कि सभी सद्धर्मी भिक्षुमात्र है ? "फिर भी महाभट्टारकपादीय महाराजकुमार।" "भिक्षु न कही का महाराज है, न महाराजकुमार।" "अच्छा भिक्षुश्रेष्ठ ! क्या मैं वहा की स्त्रियो के उद्धार में अकेली समर्थ होऊंगी?" "क्या तथागत अकेले न थे? उन्होंने जंबु महाद्वीप मे कैसे क्रान्ति कर दी है !" "किन्तु भिक्षुवर ! मैं अबला स्त्री" "तथागत की ओतप्रोत आत्मा का क्या तुम्हारे हृदय में बल नही ?" संघमित्रा ध्यान-मग्न हो गई। एक मनुष्य बीच में ही बोल उठा -क्या हम लोग तीर के निकट आ गए है ? समुद्र की लहरें चट्टानो से टकरा रही है। महाकुमार ने चिन्तित स्वर में कहा-अवश्य ही हम मार्ग भटक गए हैं, और निकट ही कोई जल-गर्भस्थ चट्टान है । आप लोग सावधानी से तरणी का सचालन -इतना कहकर उसने एक दृष्टि चारों ओर डाली। क्षण-भर बाद ही तरणी चट्टान से जा टकराई। कुमारी संघमित्रा औधे मुह गिर पड़ी, और समस्त सामग्नी अस्त-व्यस्त हो गई। कुमार ने देखा, चट्टान जल से करें।-