पृष्ठ:बगुला के पंख.djvu/५

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एक बात देखिए साहेब, इस उपन्यास में जिस दिल्ली की चर्चा है, वह सचमुच की वह दिल्ली नहीं है जो आज भारत की महा- महिमा-मण्डित राजधानी है। यह हमारी काल्पनिक दिल्ली है। और इसके सब पात्र काल्पनिक हैं। कोई जाते-शरीफ कोरे शक-सन्देह के आधार पर यह दावा करने लगें कि इसमें हमारा ही चरित्र-चित्रण किया गया है तो उनका यह दावा नहीं स्वीकार किया जाएगा। और लेखक साफ इन्कार कर जाएगा कि महाशय, हम तो आपको तथा आपसे सम्बन्धित किसी बात को जानते ही नहीं हैं, नाहक आप हमारा पल्ला पकड़ते हैं। वास्तव में यह एक अवसरवादी व्यक्ति की कहानी है, जो मनोवैज्ञानिक विश्लेषरण-मूलक अधिक और आलोचनात्मक कम है। इसमें मानवतत्त्व में अधिष्ठित जीवन-ज्ञान, वासना और प्रवृत्ति के नैसर्गिक संघर्ष का संतुलित वर्णन है । . -लेखक