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प्रेम-पंचमी

था। अब तक कहीं उन लोगों का पता नहीं! अवश्य हम देर में पहुँचे। विद्रोहियों ने अपना काम पूरा कर लिया। लखनऊ-राज्य की स्वाधीनता सदा के लिये विसर्जित हो गई!

ये लोग निराश होकर लौटना ही चाहते थे कि अचानक बादशाह का आर्तनाद सुनाई दिया था। कई हजार कंठों से आकाशभेदी ध्वनि निकली―हुज़ूर को खूदा सलामत रक्खे, हम फिदा होने को आ पहुँचे!

समस्त दल एक ही प्रबल इच्छा से प्रेरित होकर, वेगवती जलधारा की भाँति, घटना-स्थल की ओर दौड़ा। अशक्त लोग भी सशक्त हो गए। पिछड़े हुए लोग आगे निकल जाना चाहते थे। आगे के लोग चाहते थे कि उड़कर जा पहुँँचे।

इन आदमियों की आहट पाते ही गोरो ने बंदूके भरी, और २५ बंदूकों को बाढ़ सर हो गई। रक्षाकारियो में से कितने ही लोग गिर पड़े; मगर क़दम पीछे न हटे। वीर-मद ने और भी मतवाला कर दिया। एक क्षण में दूसरी बाढ़ आई; कुछ लोग फिर वीर-गति को प्राप्त हुए। लेकिन कदम आगे ही बढ़ते गए। तीसरी बाढ़ छूटनेवाली ही थी कि लोगो ने विद्रोहियो को जा लिया। गोरे भागे।

लोग बादशाह के पास पहुँचे। अद्भुत दृश्य था। बादशाह रोशनुद्दौला की छाती पर सवार थे। जब गोरे जान लेकर भागे, तो बादशाह ने इस नर पिशाच को पकड़ लिया था, और उसे बल पूर्वक भूमि पर गिराकर उसकी छाती पर बैठ गए था।