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प्रेम-पचंमी

वह द्वार पर आकर खड़ी हो जाती है। गाँँव की स्त्रियों की प्रशंसा से उसे संतोष नहीं होता। गाँव के पुरुषों को वह श्रृंगार-रस-विहीन समझती है। इसलिये सुरेशसिंह को बुलाती है। पहले वह दिन में एक बार आ जाते थे; अब शीतला के बहुत अनुनय-विनय करने पर भी नहीं आते।

पहर रात गई थी। घरों के दीपक बुझ चुके थे। शीतला के घर में दीपक जल रहा था। उसने कुँअर साहब के बग़ीचे से बेले के फूल मँगवाए थे, और बैठी हार गूँँथ रही थी―अपने लिये नहीं, सुरेश के लिये। प्रेम के सिवा एहसान का बदला देने के लिये उसके पास और था ही क्या?

एकाएक कुत्तों के भूँकने की आवाज़ सुनाई दी, और दम- भर में विमलसिंह ने मकान के अंदर क़दम रक्खा। उनके एक हाथ में संदूक थी, दूसरे हाथ में एक गठरी। शरीर दुर्बल, कपड़े मैले, दाढ़ी के बाल बढ़े हुए, मुख पीला; जैसे कोई कैदी जेल से निकलकर आया हो। दीपक का प्रकाश देखकर वह शीतला के कमरे की तरफ चले। मैना पिजरे में तड़फड़ाने लगी। शीतला ने चौककर सिर उठाया। घबराकर बोली―“कौन?” फिर पहचान गई। तुरंत फूलो की एक कपड़े से छिपा दिया। उठ खड़ी हुई, और सिर झुकाकर पूछा―“इतनी जल्दी सुध ली!”

विमल ने कुछ जवाब न दिया। विस्मित हो-होकर कभी शीतला को देखता और कभी घर को। मानो किसी नए संसार में पहुँँच गया है। यह वह अधखिला फूल न था, जिसकी पँख-