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मृत्यु के पीछे

ने मानसिक शक्तियों का शिथिल कर दिया। स्नायु निर्जीव हो गए। उन्हें ज्ञात होने लगा कि अब मैं कानून के लायक नहीं रहा, और इस ज्ञान ने क़ानून के प्रति उदासीनता का रूप धारण किया। मन में संतोष-वृत्ति का प्रादुर्भाव हुआ। प्रारब्ध और पूर्व संस्कार के सिद्धांतों की शरण लेने लगे।

एक दिन मानकी ने कहा―“यह क्या बात है? क्या क़ानून से फिर जी-उचाट हुआ?”

ईश्वरचंद्र ने दुस्साहस-पूर्ण भाव से उत्तर दिया―“हाँ, भई, मेरा जी उससे भागता है।”

मानकी ने व्यंग्य से कहा―“बहुत कठिन है?”

ईश्वरचद्र―कठिन नहीं है, और कठिन भी होता, तो मैं उससे डरनेवाला न था; लेकिन मुझवकालत का पेशा ही पतित प्रतीत होता है। ज्यो-ज्यो वकीलो की आंतरिक दशा का ज्ञान होता है, मुझे उस पेशे से घृणा होती जाती है। इसी शहर में सैकडों वकील और बैरिस्टर पड़े हुए हैं, लेकिन एक व्यक्ति भी ऐसा नहीं, जिसके हृदय में दया हो, जो स्वार्थपरता के हाथों बिक न गया हो। छल और धूर्तता इस पेशे का मूल- तत्त्व है। इसके बिना किसी तरह निर्वाह नहीं। अगर कोई महाशय जातीय आंदोलन में शरीक भी होते है, तो स्वार्थ- सिद्धि के लिये, अपना ढोल पीटने के लिये। इन लोगों का समग्र जीवन वासना-भक्ति पर अर्पित हो जाता है। दुर्भाग्य से हमारे देश का शिक्षित समुदाय इसी दर्गाह का मुजावर