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प्रेमचंद को सर्वश्रेष्ठ कहानियाँ


करके दोनों को गिरा लें। पर यह दोनों उस्ताद थे। उसे यह अवसर न देते थे। एक बार साँड़ झल्लाकर हीरा का अन्त कर देने के लिए चला, कि मोती ने बगल से पाकर उसके पेट में सींग भोंक दी। साँड़ क्रोध में आकर पीछे फिरा तो हीरा ने दूसरे पहलू में सींग चुभा दिया। आखिर बेचारा जख्मी होकर भागा, और दोनों मित्रों ने दूर तक उसका पीछा किया। यहाँ तक कि साँड़ बेदम होकर गिर पड़ा। तब दोनों ने उसे छोड़ दिया।

दोनो मित्र विजय के नशे में झूमते चले जाते थे।

मोती ने अपनी सांकेतिक भाषा में कहा-मेरा जी चाहता था कि बचा को मार ही डालूँ।

हीरा ने तिरस्कार किया-गिरे हुए वैरी पर सींग न चलाना चाहिए।

'यह सब ढोंग है। वैरी को ऐसा मारना चाहिए कि फिर न उठे।'

'अब घर कैसे पहुंचेगे, यह सोचो।'

'पहले कुछ खा ले, तो सोचे।

सामने मटर का खेत था ही। मोती उसमें घुस गया। हीरा मना करता रहा; पर उसने एक न सुनी। अभी दो-ही-चार ग्रास खाये थे कि दो आदमी लाठियाँ लिये दौड़ पड़े, और दोनों मित्रों को घेर लिया। हीरा तो मेंड़पर था, निकल गया। मोती सींचे हुए खेत में था। उसके खुर कीचड़ में धँसने लगे। भाग न सका। पकड़ लिया गया। हीरा ने देखा, संगी संकट में है, वो लौट पड़ा। फॅसेंगे तो दोनो साथ फँसेंगे। रख वालों ने उसे भी पकड़ लिया।

प्रातःकाल दोनों मित्र कॉंजीहौस में बन्द कर दिये गये।

( ५ )

दोनों मित्रों को जीवन में पहली बार ऐसा सबका पड़ा कि सारा दिन बीत गया और खाने को एक तिनका भी न मिला। समझ ही में न आता था, यह कैसा स्वामी है। इससे तो गया फिर भी अच्छा था। वहाँ कई भैसे थीं; कई बकरियों, कई घोड़े, कई गधे पर किसी के सामने चारा न था;