पृष्ठ:प्रेमघन सर्वस्व भाग 1.djvu/६७

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तब तिन मैं चढ़ि कूदत हम सब खै मन प्रमुदित।
औरहु खेल अनेक भाँति के होत नए नित॥४८६॥
जात हिंगाए खेत जबै हेगन चढ़ि हम सब॥
खात चोट गिरि पै हटको मानत कोउ को कब॥४८७॥
नई तिहाई के अँखुआ खेतन ज्यों ऊगत।
खात चना के साग सिवारन में शिशु घूमत॥४८८॥
मटरन की फलियाँ कोउ चुनत बूट कोउ चाभैं।
ऊमी भूनि चबात कोउ गुनि अतिसै लाभै॥४८९॥
होरहा कोऊ जलाय खात कच्चा रस पीवत।
चुहत ईख कोऊ छीलि गंडेरी के रस चूसत॥४९०॥
चलत कुल्हार जवै कोल्हुन पर चढ़त धाय कोउ।
कातरि के तर गिरत बैल चौंकत उछरत दोउ॥४९१॥
चोट खाय कोउ रोवत दूजो चढ़त धाय के।
टिकुरी छटकत परत सीस पर तब ठठाय कै॥४९२॥
हँसत, अन्य, शिशु, सबै मजूरे सोर मचवत।
समाचार ये देवे हित इत उत वे धावत॥४९३॥
तऊ न होत बिराम विनोद तहाँ लगि तहँ पर।
जब लगि रच्छक प्यादा पहुँचत कै कोउ गुरु वर॥४९४॥

जाड़काल की क्रीड़ा

जाड़न मैं लखि सब कोउन कहँ तपते तापत।
कोऊ मड़ई मैं बालक गन कौड़ा बिरचत॥४९५॥
विविध बतकही मैं तपता अधिकाधिक बारत।
जाकी बढ़िके लपट छानि अरु छप्पर जारत॥४९६॥
कोलाहल अति मचत भजत तब सब बालक गन।
लोग बुझावत आगि होय उदविग्न खिन्न मन॥४९७॥
खोजत अरु जाँचत को है अपराधी बालक।
पै कछु पता न चलत ठीक है कहा, कहाँ तक॥४९८॥