पृष्ठ:प्रेमघन सर्वस्व भाग 1.djvu/६१९

यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
—५९७—

मूरत मयन, रस मय बयन कहि कहि अली
वह लोक लाज नसावै।
झोली गुलाल भरे, लिये पिचकारी इत धावै।
प्रेमघन छन छन तकत इत घात लाय
लंगर लपकत हाय वाके हाथ सों को मोहिं बचावै।

तीसरी


तोरी प्यारी लागत गारी।
मैं तो बारी तिहारी कारी सूरत पर, चित चोर पिय वनवारी।
भीजी प्रेम रंग में तेरे क्यों मारत पिचकारी
बदरीनरायन पिय भला क्यों भाल
मलत गुलाल नैनन, परत छवि।
नहिं लखि परत, मन हरन हारी तिहारी।

चौथी


नीकी ऐसी नाहिं ठिठोली।
कर धर लगत गर हाय बरबस, देख दरकी चोली।
समझ चाल कुचाल तिहारी, ना मैं ऐसी भोली।
तुम प्रेमघन बरसाय रंग, नहिं मोहिं यह
भावै तनक, लागै आग ऐसी होली।