पृष्ठ:प्रेमघन सर्वस्व भाग 1.djvu/५५९

यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
—५३६—

भोली गुनि भरमावः काउ रिझावः? हम ना रीझब रामा।
हरि २ समुझावः जिनि के के बहुत कसाला रे हरी॥

लालिच काउ दिखावः हम ना पहिरब झुलनी झूमक रामा।
हरि २ चम्पाकली टीक, ना बुन्दा बाला रे हरी॥

आगि लगै तोहरी जरतारी-सारी, लहँगा, चोली रामा।
हरि २ तुहऊँ ऊँ धरि खाय नाग कहुँ काला रे हरी॥

हम ना चाही राज पाट धन धाम तोहार गुलामी रामा।
हरि २ नावँ और के लिखः मकान कबाला रे हरी॥

जिनि चुमकार पुचकारः बसि बहुत प्रेम दिखलावः रामा।
हरि बिना काम जिन भरः आह औ नाला रे हरी॥

असी बरिस कै भयः बूढ़ तूँ, जेस हमार परपाजा रामा।
हरि २ हम बारहै बरिस के अबहीं बाला रे हरी॥

पापी बेईमान! भला तें कुकरम कवन बिचारे रामा।
हरि २! लाज धरम सब धोय धाय पी डाला रे हरी॥

जब लग चढ़े जवानी हम पर तब तक तूँ मरि जाब्यः रामा।
हरि २ तब हमार फिर होयः कवन हवाला रे हरी॥

फेरि कैसे मन मिलै कहः तो मुरदा औ जिन्दा कै रामा।
हरि २ होय प्रेम कैसे, जहँ रस के ठाला? रे हरी॥

बूड़ि मरत्यः चिल्लू पानी मः, का मुहवां दिखलावः रामा।
हरि २ भल चाहः तौ "रट: राम लै माला" रे हरी॥

बूढ़े प्रेमी सुजन प्रेमघन की सुनि सीख बिचारौ रामा।
हरि २ "तजौ बुढ़ाई में तौ गड़बड़ झाला" रे हरी॥१४०॥