पृष्ठ:प्रेमघन सर्वस्व भाग 1.djvu/४७७

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को मोहन मोहन मन वारी तेरो बीर अयानी।
चलि घर लौटि लाज कित बेचै क्यों खोवै कुल कानी॥
काके प्रेम प्रेमघन माती बेगि बताय वखानी॥१४२॥

जसुदा मनही मन मुसुक्यानी
सुनत उरहनो राधा के मुख, मुग्ध मनोहर बानी॥
चहत खुटाई हरि की भाखनि पै नहि सकत बखानी।
हियो सराहत जाहि सहस मुख ताही सों सतरानी॥
कहत तिहारो मोहन टोनो सीखो सो नंदरानी।
चितवत चितहि अचेत देत करि रंचक भौंहन तानी॥
हाट बाट बन कुंजनि दौरत देख नारि बिरानी।
हँसि हँसि रार मचाय लुभावत रोकै मग हठ ठानी॥
नहि बताय बातैं कछु बातैं करत सबै मन मानी।
हाय समाय गयो सो हिय, का कीजै परत न जानी॥
याको आप उपाय कोऊ वतरायो बेगि सयानी।
भरी प्रेम घनश्याम प्रेमघन बकत खरी अनखानी॥१४३॥

जसुदा फिर पीछैं पछतानी।
श्यामसुन्दर ऊखल मैं बाँधत, तव न तनक सकुचानी॥
कजरारे मृग नैननि अँसुवा लखि छतिया थहरानी॥
नैन नीर कन छीर पयोधर मुख सो कढ़त न बानी।
गद्‍गद् कंठ कही तू कारो लंगराई की खानी॥
सुनि डरपे से दामोदर लै ऊखल भजि जानी।
तोरे तरुवर जुगल जाय जब लखि लीला अकुलानी॥
दौरी जाय ललकि उर लागी भागि सराहि सयानी।
मुख चूमति भरि प्रेम प्रेमघन पुनि पुनि संक सकानी॥१४४॥

पद


ऊधो कहा कही उन कैसे!
हा हा फेरि समुझि समुझावो रहे जहां जित जैसे॥