पृष्ठ:प्रेमघन सर्वस्व भाग 1.djvu/४०७

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सौभाग्य-समागम
अथवा
भारत सम्राट सम्मिलन
श्री पंचम जार्ज के दिल्ली में साम्राज्याभिषेक पर
बधाई और स्वागत सम्बन्धी कविता



दोहा


श्री जगदीश दया दियो यह शुभ अवसर आज।
आनन्दित आरज प्रजा लखि तुहिं भारतराज॥

भूलि आधि अरु व्याधि दुख तथा अनेक उपाधि।
निज अभिनव भूपति रही उल्लासित आराधि॥

अगिले दिन जहँ के मनुज निज नृप दरसन पाय।
करत निछावरि प्रान धन साचहुँ हिय हरषाय॥

सुनि आगमन स्वदेश में विविध मङ्गलाचार।
करि अरचत नर नाँह पद सह स्वागत सत्कार॥

पै पिछले दिन इत भई सबै बात बिपरीत।
आवन सुनि सम्राट को होत परम भयभीत॥

निश्चय जानत नास जे मान, प्रान, धन धर्म।
निज रच्छा हित जिन रहत एक पलायन कर्म॥

करि सूनो जनपद भजत हाहाकार मचाय।
"ईस! न आवै नृप इतै, बारहिं बार मनाय॥"