पृष्ठ:प्रेमघन सर्वस्व भाग 1.djvu/१८४

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अकटोटा को घसि तिलक, लम्बी लिये लगाय।
उठि भोरहीं अन्हाय तजि, गृह सों चले पराय।
लगे उखारन कुश कियो, साचहुँ वाको नास।
निज पुरखा चांडक्य की, मानहुँ पूरत आस॥
दर्भ गट्ठ दाबे बगल, लोटिया लीने हाथ।
चले जात जजमान के, पीछे पीछे साथ॥
कोऊ गंगा तट पहुँचि, तरपन रहे कराय।
मन्त्र न जानै भल रहे, गबड़ गबड़ बतुआय।
देवालय में बैठि कोउ, पिण्डा रहे पराय।
बखत बितावत सूंघि कै, सुंघनी औ मुंह बाय॥
आवै जाय न मन्त्र कछु, पढ़े लिखे है नाहिं॥
धरु पैसा धरु दच्छिना, इतनो बोलत जाहिं॥
केवल उपरोहित नहीं, सांचे अरथ समान॥
खान पान अरु दान मिसि, मूड़त सिर यजमान।
भोजन के डकरत चलें, बूढ़े बैल समान।
पाय दच्छिना टेंट मै, खोंसत कचरत पान॥
बहुतेरे यजमान के, द्वार रहे चिल्लाय।
दे पूरी चण्डाल तैं, रहे मूड पिरवाय॥
डोम मूस हर नट रहे , सकुल द्वार बिललाय।
जूठी पातरि हित रहे, नाउन सों गुर्राय।
स्वान चाभि निज ग्रास, दूजे हित चल्यो पराय॥
काँव काँव करि कार के, वृन्द रहे मड़राय॥
घूमति ग्वालिन गूजरी, दही बेजिबे काज।
मोल लेन वारेन को, मोल लेत मन आज॥
काजर रेख भरे बड़े, नैनन रही मुरेर।
सब बजार सों भाव में, बेचत कम एक सेर॥
भोरे गोरे मुख रही, नील बसन छबि छाय।
उभरे उरज उतङ्ग सो, जनु हिय में धंसि जाय॥