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तृतीय सर्ग

जब कभी बढती उर की व्यथा ।
निकट जा करके तब द्वार के ।
वह रहे नभ नीरव देखते ।
निशि - घटी अवधारण के लिये ॥२४॥

सब - प्रबन्ध प्रभात - प्रयाण के ।
यदिच थे रव - वर्जित हो रहे ।
तदपि रो पडती सहसा रहीं ।
विविध कार्य-रता गृहदासियाँ ।।२५।।

जब कभी यह रोदन कान मे ।
व्रज - धराधिप के पडता रहा ।
तड़पते तब यो वह तल्प पै ।
निशित-शायक - विद्धजनो यथा ॥२६॥

ब्रज - धरा - पति कक्ष समीप ही ।
निपट - नीरव कक्ष विशेप मे ।
समुद थे व्रज - वल्लभ सो रहे ।
अति - प्रफुल्ल मुखांबुज मंजु था ॥२७॥

निकट कोमल तल्प मुकुन्द के ।
कलपती जननी उपविष्ट- थी ।
हा. अति - असयत अश्रु - प्रवाह से ।
वदन - मण्डल प्लावित था हुआ ॥२८॥

हृदय मे उनके उठती रही ।
भय-भरी अति-कुत्सित-भावना ।
विपुल - व्याकुल वे इस काल थी ।
जटिलता - वश कौशल- जाल की।।२९।।