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शाब्दिक विकलांगता

इस ग्रन्थ में जायेगे, वैसाही, वैसीही इत्यादि के स्थान पर जायेंगे, वैसिही, वैसही इत्यादि भी कही-कही लिखा गया है। यह शाब्दिक विकलागता पद्य में इस सिद्धान्त के अनुसार अनुचित नहीं समझी जाती “अपि माष मप कुर्यात् छन्दोभड़़्ग न कारयेत्” । अतएव इस विषय में मै विशेष कुछ लिखने की आवश्यकता नहीं समझता। केवल ‘जायँगे' के विषय में इतना कह देना चाहता हूँ कि अधिकांश लेखक गद्य में भी इस क्रिया को इसी प्रकार लिखते है। नीचे के वाक्यो को देखिये——

“अरे वेणुवेत्रक, पकड़ इस चन्दनदास को घरवाले आप ही रो पीट कर चले जायेंगे"

——भारतेंदु हरिश्चन्द्र (मुद्राराक्षस)

“धार्मिक अथवा सामाजिक विषयों पर विचार न किया जायगा, हिन्दी समाचार पत्रों में छापने के लिये भेज दी जाय"

——द्वि० हि० सा० स० वि० प्रथम भाग पृष्ट ५०-५१

अब इसके प्रतिकूल प्रयोगो को देखिये——

“कहीं भी इतने लाल नहीं होते कि वे बोरियो में भरे जावे ।"
“हिन्दी भाषा के उत्तमोत्तम लेखों के साथ गिना जावे।"
“धीरे धीरे अपने सिद्धान्त के कोसों दूर हो जावेंगे।'

——द्वि० हि० सा० स० वि० की भूमिका पृष्ठ १, २, ४,

"मेरे ही प्रभाव से भारत पायेगा परमोज्ज्वल ज्ञान ।"
"मिट अवश्य ही जायेगा यह अति अनर्थकारी अज्ञान ।"
"जिसमें इस अभागिनी का भी हो जावे अब वेड़ा पार ।"

——श्रीयुत् प० महावीरप्रसाद द्विवेदी

मेरा विचार है कि जायेंगे, जायगा, दी जाय इत्यादि के स्थान पर जायेंगे या जावेगे, जायेगा वा जावेगा, दी जाये वा दी जावे