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प्राकृत, कोमल, कान्त और मधुर होकर भी क्यो त्यक्त हुई ? इस लिये कि सर्वसाधारण का संस्कार और हृदय उसके अनुकूलन रहा, इस लिये कि वह बोलचाल की भाषा, से दूर जा पडी और बोधगम्य न रही । संस्कृत के शब्द बोलचाल की भाषा से और भी दूर पड गये थे, और वह भी बोधगम्य नहीं थे, किन्तु धार्मिक-संस्कार ने उसके साथ सहानुभूति की, और इस सहानुभूति-जनितहृदय-ममता ने उसको पुन समादर का पान दिया। एक बात और है—मुख-सुविधा और श्रवन-सुखदाता मानसिक श्रम के सम्मुख आहत और वांछनीय नहीं होती, और कान्तता एवं कोमलता धार्मिक किवा जाति-भाषा-मूलक-संस्कार और तज्जनित-हृदय-ममता के सामने स्थान और सम्मान नहीं पाती। मुख और श्रवण मन के अनुचर है । जिस कविता के पठन करने में मुख को सुविधा हुई, सुनने में कान को आनन्द हुआ, किन्तु समझने में मन को श्रम करना पड़ा, तो वह कविता अवश्य उद्वेगकर होगी, और यदि अपार श्रम करके भी मन उसको न समझ सका तो उसकी कान्तता और कोमलता उसकी दृष्टि में कठोरता, दुरूहता और जटिलता की मूर्ति छोड़ और क्या होगी? इसके विपरीत वह यदि लिखने पढने किवा बोलचाल की भाषा की निकटवर्तिनी हो, मन के श्रम का आधार न हो, और उसमे मुख-सुविधाकारक अथच श्रवण-सुखद शब्द पर्याप्त न भी पाये जावे तो भी वह कविता आहत और गृहीत होगी, और उसके श्रवण-कटु एव मुख-असुविधाकारक शब्द कोमल और कान्त वन जावेगे, क्योकि सुविधा ही प्रधान है।

जब इस व्यापार में धार्मिक किवा जातिभाषा-मूलक संस्कार भी आकर सम्मिलित हो जाता है तब इसका रंग और गहरा हो जाता है । ब्रजभाषा ऐसी मधुर भाषा दुसरी नहीं मानी जाती,किन्तु कुछ लोगो का विचार है कि फारसी के समान मधुर भाषा संसार