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यदि इन श्लोको और गध अवतरणों को पढ़कर यह युक्ति जावे उपस्थित की जावे कि प्राकृत भाषा की उत्पत्ति कैसे हुई ? प्राकृत भाषा की उत्पत्ति का कारण यही है न कि संस्कृत के कठिन शब्दों को सर्व साधारण यथा रीति उच्चारण नहीं कर सकते थे, वे उदाहरण सौकर्य-साधन और मुख की सुविधा के लिये उसे कुछ कोमल और सरल कर लेते थे क्योकि मनुष्य का स्वभाव सरलता और सुविधा को प्यार करता है, तो यह सिद्ध है कि प्राकृत भाषा की उत्पत्ति ही सरलता और कोमलतामूलक है। अर्थात् प्राकृत भाषा उसीका नाम है जो संस्कृत के कर्कश शब्दों को कोमल स्वरूप में ग्रहण कर जन-साधारण के सम्मुख यथाकाल उपस्थित हुई है,और ऐसी अवस्था मे यह निर्विवाद है कि संस्कृत भाषा से प्राकृत कोमल और कान्त होगी । मै इस युक्ति को सर्वाश में स्वीकार करने के लिए प्रस्तुत नही हूँ। यह सत्य है कि प्राकृत भाषा में अनेक शब्द ऐसे है जो संस्कृत के कर्कश स्वरूप को छोड़ कर कोमल हो गये है। किन्तु कितने शब्द ऐसे है जो संस्कृत शब्दो का मुख्य रूप त्याग कर उच्चारण-विभेद से नितान्त कर्ण-कटु हो गये है और यही शब्द मेरे विचार मे प्राकृत वाक्यो को संस्कृत वाक्यो से अधिकांश स्थलो पर कोमल नहीं होने देते ।

निम्नलिखित शब्द ऐसे है जो संस्कृत का कर्कश रूप छोड़ कर प्राकृत में कोमल और कान्त हो गये है——


संस्कृत
धर्म
गन्धर्ब
प्रशसन्ति


प्राकृत
धम्म
गन्धब्ब
पससन्ति


सस्कृत
गर्ब
दर्शिन
प्रमाद


प्राकृत
गब्ब
दस्सिनो
प्रमादो


संस्कृते
पुत्र
अप्रमादेन
सर्व


प्राकृत
पुत्त
अप्पमादेन
सब्ब