पृष्ठ:प्रियप्रवास.djvu/२०४

यह पृष्ठ जाँच लिया गया है।
१३१
दशम सर्ग

उद्विग्ना औ विपुल-विकला क्यो न सो धेनु होगी ।
प्यारा लैरू अलग जिसकी आँख से हो गया है ।
ऊधो कैसे व्यथित - अहि सो जी सकेगा बता दो ।
जीवोन्मेषी रतन जिसके शीश का खो गया है ॥७०॥

कोई देखे न सब - जग के बीच छाया अंधेरा ।
ऊधो कोई न निज - हग की ज्योति - न्यारी गॅवावे ।
रो रो हो हो विकल न सभी वार बीतें किसी के ।
पीड़ाये हो सकल न कभी मर्म - वेधी व्यथा हो ॥७१।।

ऊधो होता समय पर जो चारु चिन्ता - मणी है ।
खो देता है तिमिर उर का जो स्वकीया प्रभा से ।
जो जी मे है- सुरसरित सी स्निग्ध - धारा बहाता ।
वेढा ही है अवनि - तल मे रत्न ऐसा निराला ‌।।७२॥

ऐसा प्यारा रतन जिसका हो गया है पराया ।
सो होवेगी व्यथित कितना सोच जी मे तुम्ही लो ।
जो आती हो मुझ पर दया अल्प भी तो हमारे ।
सूखे जाते हृदय - तल मे शान्ति - धारा वहा दो ॥७३।।

छाता जाता ब्रज - अवनि में नित्य ही है अंधेरा ।
जी मे आशा न अब यह है मैं सुखी हो सकूॅगी ।
हॉ, इच्छा है तदपि इतनी एकदा और आके ।
न्यारा - प्यारा - वदन अपना लाल मेरा दिखा दे ॥७४।।

मैंने वातें यदिच कितनी भूल से की बुरी है ।
ऊधो बॉधा सुअन कर है ऑख भी है दिखाई ।
मारा भी है कुसुम - कलिका से कभी लाडिले को ।
तो भी मै हूँ निकट सुत के सर्वथा मार्जनीया ।।१७५‌‌।।