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की योजना न होगी तब तक भारत के अन्य प्रान्तो के विद्वान उससे सच्चा आनन्द कैसे उठा सकते है? यदि राष्ट्रभाषा हिन्दी के काव्य-ग्रंथो का स्वाद अन्य प्रान्तवालों को भी चखाना है तो उन्हे संस्कृत के मन्दाक्रान्ता, शिखरिणी, मालिनी, पृथ्वी, वसंततिलका, शार्दूलविक्रीडित आदि ललित वृत्तो से अलंकृत करना चाहिये। भारत के भिन्न-भिन्न प्रान्तो के निवासी विद्वान् संस्कृत-भाषा के वृत्तो से अधिक परिचित है, इसका कारण यही है कि संस्कृत भारतवर्ष की पूज्य और प्राचीन भाषा है। भाषा का गौरव बढ़ाने के लिये काव्य में अनेक प्रकार के ललित वृत्तो और नूतन छन्दो का भी समावेश होना चाहिये।"

साहित्यमर्मज्ञ, सहृदयवर, समादरणीय श्रीयुत पण्डित मन्नन द्विवेदी, सम्वत् १९७० में प्रकाशित 'मर्यादा' की ज्येष्ट, आषाढ़ की मिलित संख्या के पृष्ठ ९६ में लिखते है—

"यहाँ एक बात बतला देना बहुत जरूरी है। जो बेतुकान्त की कविता लिखे, उसको चाहिये कि संस्कृत के छन्दों को काम में लाये। मेरा ख्याल है कि हिन्दी पिंगल के छन्दो में बेतुकान्त कविता अच्छी नहीं लगती। स्वर्गीय साहित्याचार्य प॰ अम्बिकादत्त जी व्यास ऐसे विद्वान् भी हिन्दी-छन्दो में अच्छी बेतुकान्त कविता नहीं कर सके। कहना नहीं होगा कि व्यास जी का 'कंसवध' काव्य बिल्कुल रद्दी हुआ है।"

अब रही यह बात कि संस्कृत-छन्दो का प्रयोग मैं उपयुक्त रीति से कर सका हूँ या नहीं, और उनके लिखने में मुझको यथोचित सफलता हुई है या नहीं। मैं इस विषय में कुछ लिखना नही चाहता, इसका विचार भाषा-मर्म्मज्ञों के हाथ हैं। हाँ, यह अवश्य कहूँगा कि आद्य उद्योग में असफल होने की ही अधिक आशंका है।