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है तब से लोगो की दृष्टि संस्कृत-वृत्तो की ओर आकर्षित है, तथापि मैं यह कहूँगा कि भाषा में कविता के लिये संस्कृत-छन्दो का प्रयोग अब भी उत्तम दृष्टि से नहीं देखा जाता। हम लोगो के आचार्य्यवत् मान्य श्रीयुत् पण्डित बालकृष्ण भट्ट अपनी द्वितीय साहित्य-सम्मेलन की स्वागत-सम्बन्धिनी वक्तृता में कहते हैं—

"आज कल छन्दो के चुनाव में भी लोगों की अजीब रुचि हो रही है, इन्द्रवज्रा, मन्दाक्रान्ता, शिखरिणी आदि संस्कृत छन्दो का हिन्दी में अनुकरण हम में तो कुढ़न पैदा करता है"

—द्वितीय हिन्दी-साहित्य सम्मेलन का कार्यविवरण २ भाग पृष्ठ ८

'प्रियप्रवास' ग्रंथ १५ अकतूबर सन् १९०९ ई॰ को प्रारम्भ और कार्य्य-बाहुल्य से २४ फरवरी सन् १९१३ ई॰ को समाप्त हुआ है। जिस समय आधे ग्रंथ को मैं लिख चुका था, उस समय माननीय पण्डित जी का उक्त वचन मुझे दृष्टिगोचर हुआ। देखते ही अपने कार्य्य पर मुझ को कुछ क्षोभ सा हुआ, परन्तु मैं करता तो क्या करता, जिस ढंग से ग्रंथ प्रारम्भ हो चुका था, उसमे परिवर्त्तन नहीं हो सकता था। इसके अतिरिक्त श्रद्धेय पण्डित जी का उक्त विचार मुझको सर्वांश में समुचित नहीं जान पड़ा, क्योकि हिन्दीभाषा के छन्दो से संस्कृत-वृत्त खड़ी बोली की कविता के लिये अधिक उपयुक्त है, और ऐसी अवस्था में वे सर्वथा त्याज्य नहीं कहे जा सकते। मैं दो एक वर्त्तमान भाषा-साहित्य-अनुरागियो की अनुमति नीचे प्रकाशित करता हूँ। इन अनुमतियो के पठन से भी मेरे उस सिद्धान्त की पुष्टि होती है, जिसको अवलम्बन कर मैंने संस्कृत-वृत्तो में अपना ग्रंथ रचा है। उदीयमान युवक कवि पं॰ लक्ष्मीधर वाजपेयी वि॰ सम्वत् १९६८ में प्रकाशित अपने 'हिन्दी मेघदूत' की भूमिका के पृष्ठ ३, ४ में लिखते है—

"जब तक खड़ी बोली की कविता में संस्कृत के ललित वृत्तो