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प्राचीन पंडित और कवि

११० प्राचीन पंडित और कवि फरमान लेकर अहमदाबाद गये थे उन्हीं के साथ वे फतहपुर के लिए पैदल रवाना हुए। पट्टन, सिद्धयुर, सिरोही, मेड़ता आदि जिन जिन स्थानों में वे पहुँचे सभी कहीं वहाँ के अधिकारियों और प्रतिष्ठित पुरुषों ने उनका यथेष्ट सत्कार किया। जब वे सॉगानेर पहुंचे तव अपने शिप्य विमलहर्ष को बादशाह के पास, अपने श्रागमन की सूचना देने के लिए उन्होंने भेजा । बादशाह ने थानसिंह आदि अपने अफसरो को श्राशा दी कि बड़ी धूमधाम के साथ हीरविजय सूरि को अगवानी की जाय । शाही अफसर और अनेक प्रमुख जैन फौज, रथ, घोड़े और हाथी लेकर सांगानेर पहुँचे । उनके साथ सूरि महाराज फतहपुर पाये । वहाँ एक रात जगमल कछवाहे के महल में वे रहे। दूसरे दिन चे शाही दरवार में उपस्थित हुए । परंतु उस समय अकबर एक बहुत आवश्यक और महत्त्व का काम कर रहा था। इस कारण उसने हार विजयसूरि की सेवा-श्रृपा का काम श्रवुलफल को सौंपा। अबुलफपल हीरविजय सूरि को अपने महल में ले गया। वहाँ उसने बड़े ही भक्ति भाव से उन्हें विठाया । कुछ देर बाद उसने हीरविजय सूरि से धर्म-संयधिनी बातें पृछौं । उसके प्रश्न का सारांश हीरसौभाग्य के अनुसार नीचे दिया जाता है- अबुलफपल ने कहा-"हमारे कुरान में लिखा है कि परने पर मुसलमान धर्म के अनुयायियों के शरीर, धरोहर