पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय रचनावली खंड 5.djvu/७

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के दान-महोत्सव वर्णन करते हुए सुएनच्चांग अधाता नही। यह सब प्रेरणा राज्यश्री की थी। इस दृश्यकाव्य का पूर्वरूप 'इन्दु' में पहले निकला, फिर 'चित्राधार' संग्रह में वह पुनर्मुदित हुआ। एक प्रकार से मैं इसे अपना प्रथम ऐतिहासिक रूपक समझता हैं। उस समय यह अपूर्ण सा-ही था, इसका वर्तमान रूप कुछ परिवत्तित और परिवर्तित है। विकटघोष और सुरमा, यद्यपि ऐतिहासिक पात्र नहीं हैं, परन्तु चीनी यात्री का एक डाकू से पकड़े जाने का उल्लेख मिलता है। हर्षवर्द्धन के जीवन का अन्तिम दृश्य इसमें नहीं दिया गया है, क्योंकि इस रूपक का उद्देश्य है-राज्यश्री का चरित्र-चित्रण ! राज्यश्री-प्राक्कथन : ७