पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय रचनावली खंड 5.djvu/५३३

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जाती। दो-एक बार ऐसा होने पर प्रसादजी ने अपनी जेब से ५ रु. निकाल मेरे हाथ में धीरे से रख दिया। उनका संकेत रुपयों को नर्तकी के हाथ में देने का था। पर वे स्वयं नहीं देना चाहते थे। मेरे हाथ से दिलाना चाहते थे। मैने रुपया अपनी जेब में रख लिया। यह देखकर उन्होंने मुझे फिर देने के लिए संकेत किया। पर मैंने रुपये नही दिये। मैंने उनसे कहा यह रुपये में किसी गरीब को दे दूंगा। यहां देने से क्या लाभ ? यह सुनकर वे मुस्कुरा उठे; फिर बोले पैसे के लिए जो यह वृत्ति स्वीकार कर ले वह क्या अमीर है ? अहरौरा के प्रसंग मे बता देना है कि वहां प्रमाद जी के पितामह श्री शिवरत्न माहु की बहन ब्याही थी और दोनों कुलो मे केवल रिश्तेदारी ही नही परस्पर अति घनिष्ट सम्पर्क भी था अहरौरा के बच्चे काशी आकर रहते और उनकी शिक्षा होती अखाड़े में उन्हें ज़ोर कराया जाता यह नही लगता था कि दो परिवार है । व्यवसाय की दृष्टि अहरौरा बहुत उन्नत रहा। वहां इसीलिए तीन वृहत आढत स्वरूप गोले थे एक हम लोगों के सम्बन्धियो का साहु बेचूलाल कन्हैयालाल का सर्वाधिक प्रशंसित इसलिए था कि जिन बैपारियों के माल का खरीदार नहीं जुटता था उमे गद्दी स्वयं खरीदकर वैपारी को नगद दाम देती थी, यह व्यवस्था अन्य दो गोलो मे नहीं थी या थी भी तो बपारियों को दबकर बाजार दर से कम मिलता था इस कारण मे अधिकांश बैपारी इसी गोले में आते थे। मुझे साह कन्हैयालाल की वह गद्दी प्रसादजी ने दिखाई थी जो गोला के प्रायः मध्य मे एक ऊँचे चबूतरे के रूप मे थी। वस्तुत यह एक पत्थर या ईट से बना सन्दूक जैसा था जिसमे चार लाख रुपए सदा भुगतान के निमित्त रहते थे गद्दी की साख प्रचण्ड थी एक छोटे से पुर्जे पर कानपुर कलकत्ता की मण्डी से दस पाँच लाख का माल आ जाता था। लाह की भी लेवा बची होती थी जब लाह का काम बढ़ा तब मिर्जापुर मे भी एक गद्दी खुली । अहरौरा से दक्षिण उसी ब्यापारी मार्ग पर स्थित पिंडरा में भी उसी परिवार की एक शाखा ने आढ़त खोली और खूब चली। किन्तु, लक्ष्मी को जब जाना होता है तब मौ चरणो मे जाती है । साहु कन्हैयालाल के बाद अवनति का क्रम चला। लाह के काम मे भारी घाटा लगा मिरजापुर का काम मुख्यतः साहु सरजू प्रसाद के जिम्मे था वे रिश्ते मे हम लोगों के भाई लगते थे। कारबार के सिलसिले में कलकत्ता आने पर स्वाभाविक था कि हमारे यहां रहतेकिन्तु भाग्य ने उनका साथ कभी नही दिया, क्या करते परिवार के लोग भी ऐसी दशा में जैसा कि होता है सरजू भयाको कथित करने लगे। प्रसादजी उनको बड़े भाई के समान मानते थे। कर्ज बहुत बढ़ गया था और उन्हें त्रस्त देखकर परिवार के अन्य पक्षों को काशी बुलाया, सरजू भैया तो वहां पहले से ही थे। कई दिनों तक केवल बातें चली निष्कर्ष कुछ नही; इस पर सब लोगों ने प्रसादजी से कहा आप जो फैसला करेंगे हमें संस्मरण पर्व : २२९