पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय रचनावली खंड 5.djvu/५०३

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गण्यमान्य साहित्यकार उक्त भोज में समुपस्थित थे, किन्तु विद्वज्जनों में सबसे कनिष्ठ थे, वाचस्पति पाठक जी और स्वयं मैं। इस प्रकार चबूतरे पर स्थित मास्तरण सज्जित प्रस्तर-आसनों पर विद्वानों की सभा जुड़ी। इस अवसर के लिए प्रसादजी ने इत्र से सुवाषित विशेष प्रकार की तम्बाकू तैयार कराई थी। उस समय काशी में मिट्टी के बड़े ही कलात्मक हुक्के बनते थे। इनकी प्रमुख विशेषता यह थी कि चिलम भी हुक्के के साथ ही बनाई जाती थी। वे हुक्के भर कर लाये गये । तम्बाकू पीने के गौकीन साहित्यकारों--राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त, रायकृष्णदास, बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', निराला आदि ने इन हुक्कों को सोल्लास ग्रहण किया। हुक्का गुड़गुड़ाते हुए अनेक साहित्यिक विषयों पर चर्चा चल रही थी। हुक्कों से निकलकर सुगन्धित धूम्र वातावरण को आमोदित कर रहा था। हुक्का पीनेवाले प्रसादजी की सुगन्धित तम्बाक की सराहना भी करते जा रहे थे। भोजन में थोड़ा ही विलम्ब था। एकाएक मेघ-घटा घिर आयी और लोगों के बचाव का अवसर दिये बिना बरसने लगी। लोग अपने-अपने हुक्के छोड़ प्रसादजी की बैठक की ओर भागे। बैठक करीने से सजी हुई थी, जिसे देख सहज ही अनुमान किया जा रम्ना था कि यह किसी रससिद्ध कवि-कलाकार की बैठक है। बैठक में पहुंच कर काव्यपाठ का दौर आरंभ हुआ। निरालाजी, अजमेरीजी और वालकृष्ण शर्मा 'नवीन' ने अपनी कवितायें सुनाकर सम्मोहन का सर्जन किया। प्रसादजी के विशेष आदेश से मुझे भी अपना एक गीत सस्वर प्रस्तुत करना पड़ा। फिर भोजन के लिए बुलावा आ गया। सभी लोग भूमि पर बिछे सुन्दर और स्वच्छ आसनों पर बैठे। संभवतः प्रसादजी की भाभीजी की बनाई कचौड़ियां और दही-बड़े बहुत प्रसिद्ध थे। मैथिलीशरणजी तो काशी आते ही प्रसादजी की भाभीजी के हाथ की बनी कचौड़ियों की फरमाइश कर बैठते थे। हम सब लोग प्रसादजी के यहां के सुस्वादु भोजन का भरपूर आस्वाद ले रहे थे। साहित्य महारथियों की, भोजन के दौरान चल रही विनोद वार्ता सुनकर भी हम आनंद विह्वल हो रहे थे। प्रसादजी के एकमात्र पुत्र रत्नशंकरजी, जो उस समय १३-१४ वर्ष के रहे होंगे, भी दत्तचित्त हो भोजन परोसने में जुटे हुए थे। वे प्रसादजी को पानी परोसना भूल गये थे जिसे लक्ष्य कर प्रसादजी ने फारसी का एक शेर पढ़ा, जिसका आशय था - ___'काफिर मरने के बाद भी अपने पितरों को जलदान करते हैं लेकिन तू मेरे जीते जी ही मुझे प्यासा रख रहा है।' इतना सुनते ही हंसी के ठहाके फूट पड़े। भोजन कार्यक्रम अपेक्षाकृत अधिक देर तक चला। साहित्यिकों के वाग्वदग्ध्य ने बहुविध व्यजनों को नवरसमय बना दिया। भोजन करते-करते उपद्रवी मेघखण्ड जा चुके थे। चन्द्रमा और तारे निकल आये थे। अब सब लोग बाहर निकल कर चबूतरे पर स्थित प्रस्तर आसन्दियों पर संस्मरण पर्व : १९९