पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय रचनावली खंड 5.djvu/४३३

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सायिक मर्म होने के कारण सुगन्धित द्रव्यों की नापतोल करते समय वह कमरे के द्वार बन्द रखते थे। कमरे का द्वार खुला। बाबू साहब आकर हम लोगों के पास बैठ गये। निराला बोले, "सुना था, आपका जी ठीक नहीं था।" "हां, अब भी ठीक नहीं है। ऋतु-परिवर्तन है । वस्त्रों की असावधानी से परसों रात ठण्ड खा गया। कल तो ज्वर भी था। प्रतिश्याप का प्रकोप अभी बना हुआ है। परन्तु आज ज्वर नहीं है", बाबू साहब ने उत्तर दिया। पान जरदा खाकर आज विशेष आनन्द आया। कस्तूरी ने शरीर को गरमी दी और सुगन्ध प्राणों में उतरने लगी। बाबू साहब को मैंने औपचारिकता से नितान्त शून्य पाया परन्तु उनमें एक विशेषता यह भी थी कि वे अहम्मन्य को अपना काव्य कभी नही सुनाते थे। वह अपने कवि की रचनाओं को पात्र देखकर ही सुनाया करते थे। विनोद ने निराला से कुछ सुनाने को कहा। उन्होंने तत्काल अपनी 'जूही की कली' वाली कविता सुनायी।": मुनायी ऐसी मुद्रा में जिसे गुरु-मुद्रा कह सकते हैं। बाबू साहब ने प्रशंसा की । निराला ने कोई दूसरी कृति सुनायी परन्तु इस आशा में कि बाबू साहब भी कुछ सुनायेंगे । इस बार भी बाबू साहब ने प्रशंसा की परन्तु स्वयं कुछ न सुनाया। बाबू साहब काव्य को ईश्वर प्रदत्त मानते थे। जब उन्होंने उसे अपना समझा ही नहीं तो उन्हें उसका अहं कैसे प्रभावित कर सकता था? उन्होंने कवि के अहं का पालन कवि की आज्ञा के समान किया। बोले, "अब फिर कभी सुन लेना। खांमी उठेगी। नहीं पढ़ा जा सकेगा।" ___ हम लोग उनके विधाम में बाधक होने की आशंका से जल्दी ही प्रणाम करके लौट आये। रास्ते में विनोद ने निराला से कहा, "न तुमने पूज्य समझा, न गुरु । तुम्हारी कविता सुनाने की मुद्रा गुरुओं वाली थी। उनके सामने सरल स्वभाव से पढ़ना चाहिए था। सूर्यकान्त, तुम नही जानते कि छन्दशास्त्र के पक्ष में बाबू साहब की मान्यताएं क्या है। उन्हें मैं समझता हूँ। उन्होंने आरम्म ब्रजभाषा की सुललित रचनाओं से किया है। छन्द बन्धनों को कभी-कभी वह स्वयं भी नहीं मानते हैं। अतुकान्त अरिल्ल छन्द में भी लिखते हैं, परन्तु उनके काव्य में प्रवाह और संगीत अवश्य रहता है। छन्द-बन्धन-मुक्त काव्य जितनी हद तक तुम लिखते हो उतना बाबू साहब प्रवाह की दृष्टि से अवरोधक समझते हैं।" निराला को दूसरे दिन एक पत्र मतवाला-मण्डल की ओर से श्रीमहादेव प्रसाद संस्मरण पर्व : १२९