पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय रचनावली खंड 5.djvu/४२३

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दुकड़हे रायसाहब के पद पर इतरायल बाट । बन गइल खानबहादुर तब्बै तउआयल बाट।" आज बाबू साहब की आंखों में फिर वैसे ही आंसू दिखाई दिये। अगले दिन हम घर पर बाबू साहब से मिले तो उन्हें कुछ लिखते पाया। उन्होंने हमें देखते ही लिखना बन्द करके रख दिया और नौकर को पान लाने को पुकारा । फिर जरदा लाने स्वयं अंदर गये और उन्होंने इधर-उधर की बातें छेड़ दीं। हमें आशा थी कि आज जो कुछ लिखा है वह हमें भी सुनने को मिलेगा परन्तु वह स्वयं भी भूल चुके थे कि हमारे पहुंचने के पूर्व वह एकान्त में बैठे क्या लिख रहे थे। परन्तु बाबू साहब ने हमारी कुछ सुनने की उत्सुकता भांप ली थी। उन्होंने उस दिन वाले लड़के के जीवट की तारीफ में दो चार शब्द कहे और उसके गाये लोक गीत की एक कड़ी गुनगुनाना आरम्भ किया, 'अंगरेजी रंगरेजवन के दल बादल आयल बाटै ।' ऐसा जान पड़ा जैसे उन्हें यह कड़ी पसन्द आयी हो।। यह बहुत दिन पीछे की बात है कि उन्होंने मुझे और 'कुसुम' को आंसू के पहले तीन छन्द सुनाये । छन्द गाकर मुनाये थे और उन्हें सुनकर मुझे 'दल-बादल आपलबाट' वाला लोकगीत याद आ गया। ____ परन्तु निश्चयपूर्वक कुछ नहीं कहा जा मकता। पता नहीं कि पहले 'आंसू' का पहला छन्द लिखा गया था, या पहले उस लड़के के मुंह से वह छन्द सुना गया था। हो सकता है यह संयोग मात्र रहा हो कि जिस छन्द में वह आंमू के प्रथम छन्द की रचना कर चुके थे, उसी को उस लड़के के मुंह से सुनकर उन्हें अच्छा लगा हो और इसीलिए उस दिन उसे घर पर हमारे सामने गुनगुनाया हो। 'आंसू' के पहले तीन छन्दों से हम लोग यह न समझ सके कि वह किसी स्फुट कविता के छन्द थे, या किसी ऐसे काव्य के छन्द थे जो लिखा जा चुकने पर किसी दिन हिन्दी कविता का गौरव ग्रन्थ माना जायगा-और, अन्य साथियों को खो देने के बहुत बाद एक दिन उमी की पृष्ठ भूमि के रूप में लिखने को मुझसे कहा जायगा, और मैं लिखूगा। ___मैंने अपने जीवन में बाबू साहब जैसा वीतराग कवि नहीं देखा। उनका हम लोगों के प्रति अगाध स्नेह था, घुल मिल कर बातें करते थे परन्तु अपनी कविता सुनाते समय वह कोई गौरव अनुभव नहीं करते। उन्होंने सदैव ऐमा अनुभव किया जैसे किसी का लिखाया हुआ सुना रहे हों। वह उसे बड़ी विनम्रता के साथ केवल एक बार सुना कर रख दिया करते थे और शीघ्र ही उसके अभिभाव से मुक्त होकर संस्मरण पर्व : ११९