पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय रचनावली खंड 2.djvu/८१

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प्रकाश (अजीगतं शस्त्र उठा कर चलता है) (आकाश की ओर देख कर) शुनःशेफ-हे हे करुणा-सिन्धु, नियन्ता विश्व के, हे प्रतिपालक तृण, वीरुध के, सर्प के, हाय, प्रभो ! क्या हम इस तेरी सृष्टि के नहीं, दिखाता जो मुझ पर करुणा नहीं। हे ज्योतिष्पथ-स्वामी ! क्यों इस विश्व की- रजनी में, तारा देते नही इस अनाथ को, जो असहाय पुकारता पड़ा दुख के गर्त बीच अति दीन हो हाय ! तुम्हारी करुणा को भी क्या हुआ, जो न दिखाती स्नेह पिता औं' पुत्र में । जगत्पिता ! हे जगद्बन्धु, हे हे प्रभो, तुम तो हो, फिर क्यों दुख होता है हमे ? याहि त्राहि करुणालय करुणा-सम मे रखो, बचा लो ! विनती है पदपद्म मे। (आकाश में गर्जन, सव त्रस्त होते है । सब शक्तिहीन हो जाते हैं । विश्वामित्र का अपने पुत्रों के साथ प्रवेश) (वमिष्ठ मे) विश्वामित्र-हे इक्ष्वाकू के कुल पूज्य कहो कहो- हे महर्षि ! कैसा होता यह काम है ? मचाया कैसा यह अन्धेर है। क्या इसमे है धर्म ? यही क्या ठीक है ? किसी पुत्र को अपने वलि दोगे कभी ! नही ! नही ! फिर क्यों ऐसा उत्पात है ? (झपटती हुई एक राजकीय दासी का प्रवेश; जो राजा और अजीगर्त की ओर देखकर कहती है) (राजा से) वासी -न्याय न्याय !! हे देव, न्याय कर दीजिये (अजीगत से) रे रे दुष्ट ! बना है ऋषि के रूप में पूर्ण कसाई अरे ! नीच ! चाण्डाल ! हा ! हाय ! ५ करुणालय : ६५