पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय रचनावली खंड 2.djvu/३२७

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दूसरा विद्यार्थी- होता कि त्रिविक्रम-अमृत होकर तुम क्या करोगे ? कब तक इस दुरन्तपूरा उदर-दरी को भरोगे ? अनन्त काल तक यह महान् प्रयास ! बड़ी कठोरता है ! दूसरा विद्यार्थी-और तुम गुरुकुल में क्यों आये हो ? सब से तो पूछ रहे हो, पहले अपनी तो बताओ। त्रिविक्रम-पहले तुम बताओ। -प्रश्न मेरा है। त्रिविक्रम-मैं तो इनसे पूछता था। तुम क्यों बीच में कूद पड़े ? अब पहले तुम्हीं बताओ। दूसरा विद्यार्थी-मैं तो पुरोहित बनूंगा। त्रिविक्रम-उत्तम ! यजमान की थोड़ी-मी सामग्री इतस्ततः करके, कुछ जलाकर, कुछ जल में फेंककर, कुछ वितरण करके और बहुत-सी अपनी कमर में रखकर एक संकल्प का जमाखर्च सुना देना; और उसको विश्वास दिला देना कि अज्ञात प्रदेश में तुम्हारी सब वस्तुयें मिल जायेगी। अरे भाई ! इससे अच्छा तो यह पुन्दर और बकरे को नचाने की विद्या सीख कर डमरू हाथ में लेकर घूमते। पहला विद्यार्थी-तुम मर्ख हो ! तुम्हारे मुंह कौन लगे ! f-अच्छा तुम क्या करने आये हो? और पढ़ कर क्या करोगे ? त्रिविक्रम-मैं ! अपनी प्रकृति के अनुसार काम करूंगा, जिसमें आनन्द मिले । और केवल पुरोहिती करने के लिए जो तुम इतनी माथा-पच्ची कर रहे हो, वह व्यर्थ है। भला पुरोहिती में पढ़ने की क्या आवश्यकता है ? जो मन्त्र हुआ, उच्च स्वर से अण्ट-शण्ट पढ़ते चले गये और दक्षिणा रखाते गये । बस हो चुका। दूसरा विद्यार्थी-अच्छा, हम अपना देख लेंगे। तुम तो बताओ कि कौन काम करोगे जिसमे बिना परिश्रम के लोग तुम्हारे अनुकूल रहें। त्रिविक्रम-किसी श्रीमन्त के यहाँ विदूषक बनूंगा। आदर से आऊँगा, जाऊँगा। कोई काम न धन्धा ! मूर्खता से भी लोगों को हँसा, लूंगा, निर्द्वन्द्व विचरण करते हुये जीवन व्यतीत करूंगा। पहला विद्यार्थी-यह क्यों नहीं कहते कि निर्लज्ज बनूंगा! त्रिविक्रम-अच्छा जाओ, अपना काम देखो। आज पुण्यक उत्सव है। गुरुजी की ओर से निमन्त्रण है। दूसरा विद्यार्थी- जनमेजय का नाग पज्ञ: ३०७