पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय खंड 3.djvu/४८९

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वह भी धीरे-धीरे अश्वारोहियो के आगे-आगे चल रहा था । सहसा पुष्यमित्र ने कहा "तुम्हारा क्या नाम है " "पिंगलक स्वामी !" "अच्छा जाओ, तुम्हारा काम नहीं है, अभी हम लोग कुछ और घूम कर आवेंगे।" पिंगलक चला गया । राजपथ अन्धकारपूर्ण था । प्रासाद की ओर न जाकर पिता-पुत्र दोनो ही पूर्व नगर-द्वार की ओर लौट पडे । "तब तो जान पडता है कि मौर्य-साम्राज्य की सध्या आ गई है । यवना का आक्रमण, उधर से खारवेल का घेरा । इस मूर्खता की भी कोई सीमा है ।" . “किन्तु मैने उस निमत्रण को जाने दिया है, यही समझकर कि उस सकट के समय सभवत. खारवेल से कुछ काम निकल जाय ।" प्रसन्नता से पुष्यमित्र ने अग्नि की पीठ थपथपाई, किन्तु वह प्रसन्नता क्षणभर की थी। पुष्यमित्र के निशस्त्राण से टकरा कर एक तीर अलग जा गिरा । दोनो सशक होकर अधकार में आँख गडाकर देखने लगे । अग्नि ने कहा चलिए, उद्यान-गृह समीप है । शत्रु चारो ओर है । मैं आपको पहुंचा कर फिर टोह लेने जाऊँगा।" पुष्यमित्र ने बाग मोडी । दोनो शीघ्र ही उद्यान के द्वार पर आये । उल्काधारी प्रहरी सामने आकर खडे हो गये । घोडो से उतर कर दोनो बातें करते हुए मुचकुन्द वृक्ष की छाया मे क्षण-भर के लिए खड़े हो गये। "जान पडता है कि कुसुमपुरी कटको से भर गई है, यह गुप्त आक्रमण !" "पिताजी । यह स्वस्तिक दल का कार्य है ।" "स्वस्तिक दल !" "हां, विद्रोहियो की एक सस्था है। मुझे उसी से खारवेल के निमत्रण का पता चला।" किन्तु तुम कैसे उनसे मिले ?" "फिर बताऊँगा ! इस समय मुझे आज्ञा दीजिए।" "किन्तु . अच्छा जाओ। पर एक बात मेरी स्मरण रखना । मगध का साम्राज्य नष्ट न होने पाए इस कर्तव्य को भूलना मत ! हो सके तो रोहिताश्व जाने वाले अश्वारोहियो की सेना पर नायक बनने का अवसर न छोड देना। क्योकि इस समय वल-सचय की आवश्यकता है । "वही होगा; किन्तु इस समय मुझे आप जाने की आज्ञा दीजिए"--कहते इरावती : ४७१