पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय खंड 3.djvu/४५९

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तितली इस उजडे उपवन से उड जाय । उसने पागलो की तरह मोहन को प्यार किया, उसे चूम लिया। अचेत मोहन करवट बदल कर सो रहा था। तितली न किवाड खोला । आकाश का अन्तिम कुसुम दूर गगा को गोद म चू पडा, और सजग होकर सब पक्षी एक साथ कलरव कर उठे। तितली इतने ही से तो नही रुकी । उसने और भी देखा, सामने एक चिरपरिचित मूर्ति । जीवन-युद्ध का थका हुआ सैनिक मधुबन विधाम-शिविर क द्वार पर खडा था। तितमो . ४३५