पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय खंड 3.djvu/४०८

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ST चुनार की एक पहाडी कन्दरा म रहते हुए, मधुवन को कई सप्ताह हो चुके थे। वह निस्तब्ध रजनी मे गगा की लहरो का, पहाडी के साथ टकराने का, गम्भीर शब्द सुना करता। उसके हृदय में भय, क्राध और घृणा का भयानक संघर्ष चला करता । उसके जीवन म आरम्भ से हो अभाव था, पर वह उसे उतना नही अखरता था जितना यह एकान्तवास । सव कुछ मिलाकर भी जैसे उसक हाथ से निकल गया। छाटी-सी गृहस्थी, उसमे तितली-सी युवती का सावधानी से भरा हुआ मधुर व्यवहार; और भी भविष्य की कितनी ही मधुर आशाएं सहसा जैसे आने वाले पतझड के झपेटे मे पडकर पत्तियो की तरह विखर कर तीन-तेरह हो गई। ___ वह अपने ही स्वार्थ को देखता, दूसरा के पचडे में न पडा होता, तो आज यह दिन देखने की वारी न आती। उसने मन-ही-मन विचार किया कि समूचा जगत मेरे लिए एक पड्यन्त्र रच रहा था । और मूर्ख मैं, एक भावना मे पडकर, एक काल्पनिक महत्त्व के प्रलोभन मे फंसकर, आज इस कप्ट में कथित हो रहा हूँ। उसके जीवन का गणित भ्रामक नहीं था। और फल अशुद्ध निकलता दिखाई पड़ रहा है । तब यह दोप उसका हो ही नही सकता । नही, इसमे अवश्य किसी दूसरे का हाथ है ! ___मुझे पिशाच के भयानक चगुल में फंसाकर सब निर्विघ्न आनन्द ले रहे हैं। कौन । राजो...तितली...मैना...सुखदेव .तहसीलदार ..और शैला । सब चुप चाप ? तब मैं स्तिने दिनो तक छिपा-छिपा फिरूंगा? और शेरकोट, वनपरिया, उसम तितली का मुन्दर-सा मुख-सोचते-सोचते उसे झपकी आ गई। भूख से भी वह पीडित था। दिन ढल रहा था; परन्तु जब तक रात न हो जाय, बाजार तक जाने में वह असमर्थ था । उसकी निद्रा स्वप्न को खीच लाई। उसन देवा-तितली हंसती हुई अपनी कुटिया के द्वार पर यही है । उधर से इन्द्रदेव पाडे पर उसी जगह आकर उतर गय । उन्हाने तिवली मे कुछ पूछा ३८४: प्रसाद वाङ्मय