पृष्ठ:प्रसाद वाङ्मय खंड 3.djvu/३४९

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डाँट मुनाई पडी-हरामजादी, झूठमूठ चिल्लाती है। सारा पान भी गिरा दिया और... ___इन्द्रदेव अभी शैला की वात सुन आये थे। यहां आते ही उन्होंने यह भी देखा। उनके रोम-रोम मे क्रोध की ज्वाला निकलने लगी। उनकी इच्छा हुई कि श्यामलाल को उसकी अशिष्टता का, समुराल मे यथेष्ट अधिकार भोगने का फल दो घूसे लगाकर दे दे। किन्तु मां और माधुरी । आह ? जिनकी दृष्टि में इन्द्रदेव से बढकर आवारा और गया-बीता दूमरा कोई नहीं । वह लोट पडे । उनके लिए एक क्षण भी वहा रुकना असह्य था । न जाने क्या हो जाय । मोटरखाने में आकर उन्होंने ड्राइवर से कहा-जल्दी चलो। वैचारे ने यह भी न पूछा कि 'कहाँ' ? मोटर हार्न देती हुई चल पड़ी। तितली: ३२१